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ISSN 2292-9754

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10.23.2014


नीड़

पर्वत के उस पार से,
नीड़ में लौटते पंछी,
डैनों को फैलाकर,
कुशलक्षेम पूछते
दिन भर के थके हारे।
पर अहा! नहीं मिलता आराम,
जहाँ बनाया था आशियाना,
बेख़ौफ़ कुछ लोग,
कर रहे थे उन्हें वीरान।
नहीं समझ रहा था कोई,
उनके मन की पीड़।
बस गिर रहे थे पेड़,
उजड़ रहे थे नीड़।
अण्डे कई फूट गए,
कुछ द्रुमदल में अटक गए।
जिन्हें शायद द्रुमदल,
अपने आँचल में छिपाकर,
महफ़ूज़ कर रहे थे।
इधर चीं-चीं के शोर में,
कुछ बूँदें पल्लवों पर गिरीं।
हतप्रभ पल्लव जो,
अपने मिटने के ग़म से।
सजल नेत्र थे,
ख़ामोश हो बादलों की तरफ़,
सिर उठाकर देखने लगे,
इस बेवक़्त की बौछार को।
मगर पलकें स्वत हो गईं बन्द,
ये बूँदें थी उन ग़मज़दा पंछियों की।
जिनके अण्डे कुछ देर पहले तक,
महफ़ूज़ थे नीड़ में।
जो अब कालग्रस्त हो,
बिखरे पड़े थे,
इंसानी भीड़ में


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