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ISSN 2292-9754

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05.09.2016


गौरी

(छंद: मनहरण घनाक्षरी)

सोलह श्रृंगार गौरी
सावली सलौनी छोरी
कजरारी अँखियों से
तीर यूँ चला गई॥

मधुर मुस्कान प्यारी
रूप रंग में हैं न्यारी
बलखाती इठलाती
दिल को जला गई॥

गाल हैं गुलाब फूल
यौवन रहा हैं झूल ।
मीठी मीठी बातें कर
मुझको छला गई ॥

कली कचनार जैसी
बसंत बहार जैसी
बदरा बहार मेरे
दिल में खिला गई॥


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