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ISSN 2292-9754

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05.09.2016


बस आज की रात

बस आज की रात
बैठो कुछ पल साथ मेरें
मैं देखता रहूँ तुम्हें
और खो जाऊँ कुछ देर
तुम्हारी प्यारी बातों में

जानता हूँ ________
बहुत कुछ कहना है तुम्हें
जल रही है विचारों की अग्नि
कब से तुम्हारे मन में
मगर सुनो_____
जैसे स्वाति की बूँद ख़ातिर
तड़पता है चकवा कोई
वैसे ही कब से
इस हसीन रात की चाह में
तड़पता रहा कब से मैं।

मालूम है मेरे जाने का ग़म
हरपल सताएगा तुम्हें
मगर मेरी यादें
अब भी पास हैं तुम्हारे
बस आँखें मूँद
महसूस कर लेना मुझे
जैसे तपस्वी कोई
महसूस करता हैं अंतर्बोध!


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