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ISSN 2292-9754

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03.23.2016


अंतिम सत्य

अंतिम सत्य…
होनी हैं मृत्यु निश्चित
फिर मनु…
क्यों हो तुम द्वंद्व में
देख इस प्रलय को॥

ये परिवर्तन तो अरे !
महज़ थोथी कपूर है
जो बदल लेती हैं रूप नया
पाकर धूप हवा का संग
और घोल देती है अपनी
सुगंध धरा के उपवन में
फिर ऐसे ही निर्जीव सा
बैठा है तू भला क्यों?

बना कोई प्रयोजन अहो!
निकाल कुछ सार अहो!
फिर क़िस्मत चमकेगी तेरी
होगा जब निर्माण नया
होगा फिर से नया सवेरा
गुंजित होगा गान नया


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