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ISSN 2292-9754

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03.23.2016


आखरों की प्रीत

अब न होगी कल
इस शहर में मेरी सहर
जाना हैं अब मुझे
निशा के गहन तिमिर में
बसाकर याद-ए-मोहब्बत तुम्हारी
लड़ना है सीमा समर में
मगर ए हमदम सुन
देख इस विरह वेला को
हो न जाना विकल तुम
ये थाम लो काग़ज़ जिसके
हरेक आखर में…
बसी हैं मोहब्बत हमारी
जब छुएगी सबा हररोज
तुम्हारे सुर्ख गालों को
तब प्यारा सा एक चुंबन दे
पढ़ना इसे मशगूल हो
क़सम से ऐ मनमीत तब
खिल उठेगा तुम्हारा चेहरा
और हो जाएगी तुमको भी
मेरे इन आखरों से प्रीत॥


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