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ISSN 2292-9754

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08.08.2017


 विदा कर दो

आओ, अब उठो!
इन बदलियों को विदा कर दो
अब इनके जाने का समय हो गया है
आ गयी है आश्विन की पालकी
जाने के समय ख़ूब ज़ोर से
दिल खोलकर रो लेंगी ये
धरती के गले लग-लगकर
मोह-ममता बह चलेगी आँखों से
इनकी ठंडी साँसें फैल जायेंगी चारों ओर

हवाओं का ख़ुशबूदार आँचल फैलाकर
बैठी हैं ये
डाल दो इनके खोइछों में
धान की बालियाँ और हल्दी
हरी-हरी ओस - भरी
दूब की फुनगियाँ
और हल्दी - छुए हरसिंगार के रजत-सिक्के
टीक दो मुस्कान -सिंदूर से इनकी माँग
बहुत-बहुत स्नेह बरसाकर
हम सबका
मानव, जीव-जंतु, कीट-पतंगों, तृण-वृक्ष
सबका आशीष पाकर
ये विदा हो जायेंगी
अपने अज्ञातपुर के लिए चल देंगी
फिर आने के लिए अगले वर्ष


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