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ISSN 2292-9754

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08.23.2017


जनानी ड्योढ़ियों के भीतर का सच : ‘गोली’

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा सृजित उपन्यास ‘गोली’ को केंद्र में रखकर अपनी बात कहने का निश्चय करते समय सबसे पहला प्रश्न जो मस्तिष्क में उभरता है, वह है, कि हम इसे किस वर्ग में रखें? यदि हम शास्त्रीजी के कथा साहित्य का वर्गीकरण करें तो उन्हें ऐतिहासिक, अर्ध-ऐतिहासिक, सामाजिक आदि कई वर्गों में बाँट सकते हैं। ‘गोली’ को हम किस वर्ग में रखें, यह एक प्रश्न है, किंतु उससे भी बड़ा प्रश्न है कि ऐतिहासिक कृति में उल्लिखित इतिहास तथा इतिहासकार द्वारा वर्णित इतिहास क्या समान होते हैं? मेरा उत्तर है ‘नहीं’। क्योंकि समान घटनाओं को साहित्यकार तथा इतिहासकार अलग-अलग चश्में से देखते हैं इसलिए उनका वर्णन भी भिन्न होता है। इतिहासकार घटनाओं को राजाओं को केंद्र में रखकर देखता है वहीं साहित्यकार समस्या को केंद्र में रखता है। ‘गोली’ के लेखक ने भी कुछ ऐसा ही किया है। उपन्यास की भूमिका में वे लिखते हैं – "इन दिनों मैंने एक नई अनुभूति प्राप्त की है- दर्द का प्यार में विसर्जन। मेरी इसी नई अनुभूति ने मुझसे नया उपन्यास ‘गोली’ लिखवा डाला है, जिसकी नायिका चम्पा का मैंने ‘दर्द का प्यार में विसर्जन’ की मनोभूमि में शृंगार किया है। इस शृंगार का देवता है किसुन"1 अपनी इस अभिव्यक्ति के साथ ही लेखक उपन्यास का नायक-नायिका तय कर देते हैं, पाठक को सोचने के लिए कोई अवकाश नहीं छोड़ते।

अब मैं अपने पहले प्रश्न पर आती हूँ, ‘गोली’ को हम किस वर्ग में रखें – ऐतिहासिक, अर्ध-ऐतिहासिक या सामाजिक? ‘गोली’ इतिहास नहीं बल्कि ऐतिहासिक उपन्यास है जिसकी कथा ने कल्पना का आश्रय भी ग्रहण किया है। एक और महत्वपूर्ण बात है कि यह उपन्यास समर्पित है सरदार वल्लभ भाई पटेल को जिन्हें लेखक ने विश्व का ‘अप्रतिम राजनीति-चक्रवर्ती’ संज्ञा से संबोधित किया है जो अपने आप में महत्वपूर्ण है तथा सांकेतिक अर्थ देता है और इतिहास की गतिविधियों की तरफ संकेत करता है।

लेखक आगे लिखते हैं – ‘जबसे ‘गोली’ का साप्ताहिक हिंदुस्तान में धारावाहिक रूप में छपना आरंभ हुआ, कई पत्र आए। जिनमें से कुछ में शंकाएँ होती थीं, आलोचना होती थी या कुछ पूछा जाता था …. जिन्हें मैं जवाब ऊँची आवाज़ में देना चाहता हूँ।… कुछ पत्र मेरे पास इस अभिप्राय के आए हैं जिनमें पूछा गया है कि इस उपन्यास को आपने क्यों लिखा है? कहीं आप राजा-महाराजाओं की पेंशन तो बंद नहीं करना चाहते? या इन गोली-गुलाम, दारोगाओं को भी पेंशन का हकदार बनाना चाहते हैं? कुछ पत्र इनसे भी दो कदम आगे हैं। उनका कहना है – कदाचित आप ऐसा साहित्य लिखकर अपना मुँह बंद करने के एवज़ में राजा-महाराजाओं से लाख-पचास हज़ार रुपया घूस में ऐंठ लेना चाहते हैं।’2

लेखक की ये स्पष्टोक्तियाँ जहाँ एक तरफ उपन्यास को ऐतिहासिक सत्य पर आधारित सिद्ध करती हैं वहीं दूसरी तरफ निम्नलिखित उद्धरण इसे कल्पनाश्रित/प्रातिनिधिक सिद्ध करता है – ‘मैंने तो राजस्थान के साठ हज़ार निरीह नर-नारियों की एक इकाई के रूप में चंपा और किसुन को आपके सामने उपस्थित किया है।’3

किंतु आगे वे यह भी कहते हैं कि – ‘यह मत समझिए कि चम्पा कोई कल्पित मूर्ति है। वह एक सजीव स्त्री है जिसकी वाणी में साठ हज़ार नर-नारी बोल रहे हैं, जिनका मुँह शताब्दियों से सिया हुआ था। जिनके मुखों पर नहीं – आत्मा पर भी गुलामी के ताले जड़े हुए थे। आज उनका मुँह खुला है तो राजा-महाराजाओं के टूटे हुए सिंहासन भी चीत्कार कर उठे हैं।’4

इन तमाम प्रमाणों का विश्लेषण करने के उपरांत इस नतीजे पर पहुँचा जा सकता है कि ‘गोली’ ऐतिहासिक कृति है। हाँ, यह अवश्य है कि लेखक ने ऐतिहासिक स्थलों, पात्रों का सामान्यीकरण किया है। उपन्यास को पढ़ते हुए पाठक को समय का अनुमान लगाना भी कठिन नहीं रह जाता। विभिन्न स्थलों पर अंग्रेज़ रेज़ीडेंटों का राजे-रजवाड़ों की कार्यवाहियों में दख़ल उपन्यास की कथा की ऐतिहासिकता को पुष्ट करते हैं। तो वहीं स्वतंत्रता पश्चात सरदार वल्लभ भाई पटेल के प्रयासों से राजे–रजवाड़ों के विलय की घटना के महत्व का संकेत लेखक उपन्यास उन्हें समर्पित करके देते हैं। किंतु उसके बाद क्या हुआ? क्या भारतीय लोकतंत्र में विलय के बाद इन रजवाड़ों के राजाओं की स्थिति में परिवर्तन आया? भारतीय लोकतंत्र पर करारा प्रहार करते हुए लेखक कहते हैं – ‘अफसोस है कि मैं भारत का प्रधानमंत्री नहीं हूँ, निरीह साहित्यकार हूँ। केवल एक आवाज़ दुनिया के मनुष्यों तक पहुँचाने की शक्ति रखता हूँ। सरकार हमारी अहिंसक है, समन्वयवादी है। पंचमेल मिठाई उसकी दुकान है। लाल रंग से वह भड़कती है। तिरंगा झंडा फहराती है और तिरंगी चाल चलती है। उसके राज्य में भला राजाओं को क्या भय?’5

उपन्यास की भूमिका में अभिव्यक्त लेखक का आक्रोश इस ऐतिहासिक उपन्यास को प्रासंगिक भी बना देता है और ‘गोली’ जैसी ऐतिहासिक कृतियों के उद्देश्य को सार्थक भी करता है। लेखक चोट करते हैं पाठक की उदासीन मानसिकता पर, वह पाठक जो लोक राज्य में आम आदमी की उदासीन मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है। वे कहते हैं – ‘मुमकिन है कि इन बातों को सुनकर आपको हँसी आ जाए। क्योंकि आपके शरीर में लहू तो है नहीं, पानी है। लहू होता तो आज क्या राजा लोग आपके लोक राज्य में मुफ्त की पेंशन खाते, जबकि आज आपकी फूल-सी बहू-बेटियाँ तक पेट के लिए मेहनत के मैदान में उतर चुकी हैं।’6

लेखक कहते हैं – ‘मैं साहित्य का सृजन तुच्छ भावनाओं से नहीं करता। मैंने तो आपको यह दिखाया है कि मानव कहाँ आहत हुआ है। एक बार उसकी ओर देख तो लीजिए।’ उपन्यास का महत्व इस दृष्टि से भी बढ़ जाता है कि लेखक यहाँ जिस आहत मानव पर दृष्टि डालने की बात करते हैं वह एक ‘स्त्री’ है। एक ‘स्त्री’ जो साठ हज़ार का प्रतिनिधित्व कर रही है और उपन्यासकार इस आहत स्त्री का चित्रण इस रूप में करते हैं कि आपकी उस पर मात्र दृष्टि ही नहीं पड़ती बल्कि ‘गड़’ जाती है और हृदय चीत्कार कर उठता है। उपन्यास की नायिका कहती है – ‘पाठक-पाठिकाओं को मेरी यह कहानी निराली-सी लगेगी, अटपटी-सी लगेगी। अटपटी मुझे भी लगती है। स्त्री हूँ, स्त्री-हृदय रखती हूँ, कुछ बुद्धि भी रखती हूँ। इसीलिए तो कहती हूँ कि जन्मजात अभागिन हूँ, स्त्री जाति का कलंक हूँ। स्त्रियों में अधम हूँ परंतु मैं निर्दोष हूँ, निष्पाप हूँ। मेरा दुर्भाग्य मेरा अपना है, मेरी जाति का है, जाति परंपरा का है, क्योंकि मैं गोली हूँ।’7

उपन्यास के आधार पर यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहती हूँ कि ‘गोली’ वह जाति है जो राजस्थान के राजे-रजवाड़ों के व्यभिचार के परिणामस्वरूप जन्मी है। उस समय राजाओं के हरम में सैकड़ों स्त्रियों का होना शान की बात समझी जाती थी जिनमें से कुछ तो रानियाँ होती थी तथा कुछ दासियाँ जिनसे राजाओं के अवैध संबंध होते थे और बच्चे भी होते थे किंतु राजा उन्हें अपना नाम नहीं देते थे क्योंकि बाद में साम्पत्तिक विवाद उत्पन्न होने की संभावना होती थी इसलिए जब कभी ऐसी स्थिति होती थी तो उस दासी का विवाह ऐसे ही किसी दास से करा दिया जाता था जो बच्चे का संवैधानिक पिता होता था और उस दासी का पति, किंतु आजीवन वह अपनी पत्नी का स्पर्श नहीं कर सकता था। राजा के ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चे गोले-गोली कहे जाते थे। जिनका अपने तन-मन-जीवन पर कोई अधिकार नहीं होता था। ये जन्मजात गुलाम होते थे तथा राजा-ठाकुरों के भोग-विलास के साधन मात्र थे। चम्पा भी ऐसे ही किसी सम्बंध से जन्मी तथा किसी राजा की पड़दायत थी और किसुन उसका वैसा ही धर्म का पति और उसके बच्चों का पिता। शिक्षा सच्चाई से वाकिफ़ कराती है। विलायत जाने तथा अंग्रेज़ महिला से शिक्षा पाने के बाद चंपा को गोली-गुलाम का जीवन विष के समान लगने लगता है।

यह उपन्यास राजस्थान के राजे-रजवाड़ों के गणराज्य में विलय होने के बाद लिखा गया अर्थात 1947 ई. के बाद, और ‘गोली’ अब स्वतंत्र भारत के स्वतंत्र नागरिक हैं। उपन्यास की ऐतिहासिकता कल्पना के लिबास में लिपटी ही पाठक के समक्ष आती है। नायिका कहती है – ‘मैं अपने जीवन की अद्भुत और रोमांचकारी कहानी तो सच्ची-सच्ची सबको सुनाऊँगी पर नाम ठिकाने सब झूठे और काल्पनिक बताऊँगी।’8

उस समय के राजपूती समाज के रीति-रिवाज़ तथा गोले-गोलियों की जीवन-गाथा का चित्रण करते हुए लेखक लिखते हैं – "किसी गोली का पड़दायत पद पर जाना और पैरों में सोना पहनना सचमुच ही गौरव और प्रतिष्ठा की चरम सीमा थी।"9

उपन्यास में लेखक ने राजपूत राजाओं और ठाकुरों की अय्याशी एवं व्यभिचार तथा प्रजा पर अत्याचार का निर्द्वंद्व वर्णन किया है। छोटे ठिकाने के ठाकुर, जिनकी आय कम हुआ करती थी, वे अपने अमल-पानी और रनवास के खर्चे डाके डलवाकर तथा लाग लेकर निकालते थे। "जो कोई लाग नहीं देता था उसकी बरात लूट ली जाती थी या दुलहिन उड़ा दी जाती थी। विवाह होने के बाद दुलहिन को सबसे पहले ड्योढ़ियों में हाज़िर होना पड़ता था, पसंद आने पर कभी-कभी ठाकुर ही सर्वप्रथम दुलहिन का कौमार्य भंग करते थे।"10

वैसे यह उपन्यास किसी विशेष समय का नहीं है बल्कि ‘गोली’ नामक जाति की वर्षों से चली आ रही प्रताड़ित जीवन-गाथा का कच्चा-चिट्ठा है। किंतु बीच-बीच में कुछ ऐसे वर्णन भी आते हैं जो प्रस्तुत उपन्यास के काल-खण्ड का प्रमाण भी देते हैं। यह उस समय की बात है जब "लड़ाई-झगड़े तो होते ही रहते थे, पर अंग्रेज़ी राज के प्रताप से युद्ध नहीं होते थे। राजपूतों का प्राचीन जीवन अब खत्म हो रहा था। राजस्थान ज्यों-ज्यों अंग्रेज़ों की छत्रछाया में आता जाता था, राजपूत आलसी होते जाते थे।"11

उपन्यास में उन दिनों के चारणों के प्रताप तथा राजपूतों की सनक का विशद चित्रण है। ‘मैं’ शैली में लिखा गया यह उपन्यास आत्मकथात्मक कृति होने का आभास भी देता है। उपन्यासकार ‘गोली’ की नायिका चम्पा की जीवन-यात्रा के हर पड़ाव को इतिहास की तरह रेखांकित भी करता है और कथा की तरह हमारी स्मृति में दर्ज़ भी करता है। इतिहास के झरोखे से यदि हम उपन्यास के पात्रों को तथा राजनैतिक गतिविधियों को देखें तो कुछ ठाकुर थे कुछ राजा थे। ठाकुर राजा के जागीरदार तथा रैयत हुआ करते थे। चंपा ऐसे ही एक ठाकुर के पड़दायत की बेटी थी। किंतु कोई फ़र्क नहीं पड़ता यदि वह ‘स्त्री’ है तो…. वह रानी हो, दासी हो, रानी की बेटी हो या पड़दायत की बेटी! स्त्रियाँ मनुष्य न थीं, बेटियाँ प्राणहीन वस्तु थीं शायद! तभी तो "ठाकुर ठिकानेदार अपनी लड़कियाँ रनवास में ठूँस देना लाभदायक समझते थे। इससे उन्हें दो लाभ थे, लड़की रानी बन जाती थी और ठिकानेदार को सदा बड़ी-बड़ी रियासती सुविधाएँ आसानी से राजा से दिलाती रहती थीं।"12 "इन सब कारणों से, चाहे बड़ा छत्रधारी राजा हो, चाहे कोई छोटा ठाकुर-ठिकानेदार, वह इस बात की परवाह नहीं करता था कि राजा की आयु क्या है, वह बूढ़ा है या कुरूप, आदमी है या जानवर और लड़की सौतों पर जाती है या सती होने के लिए।"13

स्त्रियों की ऐसी ही स्थिति थी उन दिनों राजस्थान के इस राज-समाज में! ऐसे ही वे दिन थे और ऐसे ही रीति-रिवाज़। पति पर उनका कोई अधिकार नहीं होता था। सारी रीति-नीति एवं नैतिकता सिर्फ स्त्रियों के लिए थी। उपन्यास में कुछ वर्णन रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। "सतीत्व का उन्हें पूरा निर्वाह करना पड़ता था, यद्यपि राजा पक्का लंपट और शराबी होता था।"14

यह सच है कि लेखक ने घटनाओं, स्थलों, पात्रों का सामान्यीकरण किया है किंतु तथ्यों की ऐतिहासिकता को नकारा नहीं जा सकता। केसर, किसुन महत्वपूर्ण, सुलझे हुए पात्र हैं। हालाकि समूचा उपन्यास एक गोली – चंपा को केंद्र में रखकर लिखा गया है किंतु नारी-चेतना तथा आत्मसम्मान से लबालब कुँवरी की उपेक्षा नहीं की जा सकती। जब महाराज सुहागरात को सीधे चम्पा के महल में जाते हैं तो कुँवरी अपने द्वार पर पहरा बिठा देती है और ताउम्र महाराज को पति के अधिकार से वंचित कर देती है।

उपन्यास में जहाँ एक तरफ़ राजा की नैतिक-अनैतिक सभी बातों को सिर झुकाकर मान लेने वाले पात्र हैं वहीं कुछ ‘भूरसिंह हाड़ौत’ जैसे पात्र भी हैं जो राजा को धिक्कारते हैं इस बात पर कि रंगमहल में आने की बेला में राजा दासी की चाकरी में जाता है। राजपूत बेटी के सुहाग पर बट्टा लगाने की कीमत उसे राजपूत की तलवार का पानी पीकर चुकानी पड़ेगी, यह चेतावनी भी देते हैं।

"राजाओं की विलासिता और षड़यंत्री बुद्धि का मूर्तिमान स्वरूप है ‘लालजी खवास’। राजाओं की विलासिता, सनक, मूर्खता और षड़यंत्र का प्रतिनिधित्व चम्पा के आश्रयदाता महाराज करते हैं।"15

‘गोली’ की कथा अर्ध-ऐतिहासिक है। मैंने जब राजस्थान के राजे-रजवाड़ों के इतिहास खँगालने का प्रयास किया तो ऐसे कई तथ्य सामने आए जिन्हें इस उपन्यास की कथा से जोड़ा जा सकता है किंतु स्थान विशेष, घटना विशेष अथवा पात्र विशेष का समूचा इतिहास इस रूप में नहीं प्राप्त हुआ। ‘इतिहास की पुस्तकों में, ऐतिहासिक शोधों में राजे-रजवाड़ों में बहु-विवाह की प्रथा के प्रमाण मिलते हैं।’16

यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि प्रतिष्ठित राजपूतों का काम बिना दास-दासी के चल ही नहीं सकता। उनके यहाँ दास-दासियों का होना प्रतिष्ठा का चिह्न समझा जाता था और प्राय: कन्या के विवाह के अवसर पर दास-दासी उसकी परिचर्या के लिए दहेज में दिए जाते थे।17 पत्नियों के अलावा राजपूत राजकुमार अपने हरम में सैकड़ों औरतें रखा करते थे। बड़ा हरम राजशाही का विशेषाधिकार, सरदारों का अधिकार और ज़माने का चलन माना जाता था।18

"जोधपुर का राजा तखतसिंह स्त्री, शिकार और शराब में बहुत रुचि रखता था। वह अपना अधिक समय या तो रनिवास में बिताता था या फिर शिकार में।"19

यह भी ध्यातव्य है कि लेखक ने उपन्यास में पात्रों, घटनाओं तथा स्थानों को सामान्यीकृत रूप में ही प्रस्तुत किया है, विशेष पहचान कहीं नहीं दी है। अत: यह स्वयमेव सिद्ध हो जाता है कि लेखक का उद्देश्य इतिहास का वर्णन कदापि नहीं था बल्कि इतिहास की बुराइयों को सामने लाना था जो कमोबेश रूप में वर्तमान में भी देखने को मिलती हैं।

‘गोली’ की कथा ड्योढ़ियों के भीतर का वह सच है जो शायद इतिहासकार न उजागर कर पाएँ क्योंकि इतिहासकार राजा की कथा लिखेंगे, उसकी विलासितापूर्ण जीवन-शैली का चित्रण करेंगे जो उसकी शान का प्रतीक होगी, किंतु यह ऐतिहासिक कथा एक गोली-दासी की दृष्टि से लिखी गई है बल्कि यूँ कहें कि उसने अपनी कथा स्वयं सुनाई है कि भीतर से राजा कैसा है। राजा के वीभत्स कृत्य तथा घृणित चेहरे का चित्रण, नई-नवेली रानी के स्वाभिमान का चित्रण जिस दृष्टिकोण से इसमें किया गया है, वैसा इतिहास में न मिलेगा।

राजस्थान के राजाओं के अनैतिक चाल-चलन को ठीक करने के लिए कभी-कभी अंग्रेज़ रेजीडेण्ट एवं गवर्नर जनरल भी बीच में पड़ते थे तथा चाल-चलन ठीक न करने पर गद्दी खाली करवाने की धमकी भी देते थे। इसका समय स्वतंत्रता-पूर्व का है जब रियासतें अंग्रेज़ी हुकूमत के अधीन होती थीं। अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से राजाओं की फिजूलखर्ची पर नियंत्रण रखने के लिए दीवान रखे जाते थे। वे रियासत का प्रबंध कड़े हाथों लेते थे।

चंपा के माध्यम से लेखक गद्दीनशीन राजा के भाई-बंदों के अद्भुत रहस्यपूर्ण जीवन का ख़ुलासा भी करते हैं। वे कहते हैं – "कभी-कभी उनके चरित्र अत्यंत हास्यास्पद, कभी वीभत्स और कभी भयानक भी हो जाते हैं। बहुधा साम्पत्तिक मामलों में इन भाई - बंदों में परस्पर और कभी हिज़ हाइनेस से भी झड़प हो जाती थी। ……दाद दीजिए राज-रक्त की विशेषता, पवित्रता और उच्चता की जिसकी रक्षा के लिए 50 साल की कुमारी राज-पुत्रियाँ 20 साल के गद्दीनशीन राजाओं से ब्याही जाती हैं। जहाँ कमाना-धमाना नहीं, मेहनत-परिश्रम नहीं, पड़े-पड़े हराम के माल-मलीदे उड़ाना है। पुश्त-दर-पुश्त से जागीर-ज़मीन-जायदाद मिलती जाती हो। केवल खून और वंश के नाम पर जागीर के स्वामी को न किसी योग्यता की आवश्यकता है न उसके लिए कोई शर्त या पाबंदी, कायदा कानून है।"20

लेखक तत्कालीन समाज में व्याप्त कुछ सामाजिक समस्याओं की तरफ़ भी संकेत करते हैं यह कहकर कि इन राजाओं का सारा जीवन इस तरह व्यतीत होता था कि पड़े-पड़े जागीर की आमदनी खाना, ज़ोर-जुल्म से किसानों से अपना कर वसूल करना, चमारों और दूसरे सेवा कर्म करने वालों से जबर्दस्ती बेगार लेना, बात-बात में लाग लगाना, जिसे दूसरे शब्दों में लूट ही कहा जा सकता है। "राजघरानों में उपचार हेतु जाते रहने से आचार्य चतुरसेन शास्त्रीजी राजमहलों के आंतरिक रहस्यों से भलीभाँति परिचित थे। इस उपन्यास में उन्होंने अपने इस यथार्थ ज्ञान का समुचित उपयोग किया है।"21 यह कहना यहाँ बेमानी है कि यह उपन्यास स्त्री-संवेदना तथा नारी-चेतना का रोंगटे खड़े कर देने वाला चित्रांकन है क्योंकि यह जागरूकता तो उत्तर-आधुनिक काल के भारतीय साहित्यकारों को पश्चिम की देन है (!)। स्त्री जीवन की कथा यदि स्त्री लिखे तभी वह नारी-विमर्श की कोटि में आएगी और दलित जीवन की कथा यदि दलित लिखे तभी वह दलित-विमर्श के खेमे में शामिल होगा। एक सच यह भी है कि जब यह उपन्यास लिखा गया तब इन विमर्शों का संभवत: जन्म भी नहीं हुआ था।

डॉ. अ‍नीता शुक्ल
असिस्टेण्ट प्रोफेसर, हिंदी विभाग
महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा
मो. 9428423594
ईमेल – dr.anitashukla01@gmail.com

 

संदर्भ :

1. शास्त्री, चतुरसेन, ‘गोली’, हिंद पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, आठवाँ पुनर्मुद्रण, पृ. 7
2. शास्त्री, चतुरसेन, ‘गोली’, हिंद पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, आठवाँ पुनर्मुद्रण, पृ. 9
3. शास्त्री, चतुरसेन, ‘गोली’, हिंद पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, आठवाँ पुनर्मुद्रण, पृ. 9
4. शास्त्री, चतुरसेन, ‘गोली’, हिंद पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, आठवाँ पुनर्मुद्रण, पृ. 10
5. शास्त्री, चतुरसेन, ‘गोली’, हिंद पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, आठवाँ पुनर्मुद्रण, पृ. 10
6. शास्त्री, चतुरसेन, ‘गोली’, हिंद पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, आठवाँ पुनर्मुद्रण, पृ. 12
7. शास्त्री, चतुरसेन, ‘गोली’, हिंद पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, आठवाँ पुनर्मुद्रण, पृ. 17
8. शास्त्री, चतुरसेन, ‘गोली’, हिंद पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, आठवाँ पुनर्मुद्रण, पृ. 18
9. शास्त्री, चतुरसेन, ‘गोली’, हिंद पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, आठवाँ पुनर्मुद्रण, पृ. 27
10. शास्त्री, चतुरसेन, ‘गोली’, हिंद पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, आठवाँ पुनर्मुद्रण, पृ. 23
11. शास्त्री, चतुरसेन, ‘गोली’, हिंद पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, आठवाँ पुनर्मुद्रण, पृ. 29
12. शास्त्री, चतुरसेन, ‘गोली’, हिंद पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, आठवाँ पुनर्मुद्रण, पृ. 49
13. शास्त्री, चतुरसेन, ‘गोली’, हिंद पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, आठवाँ पुनर्मुद्रण, पृ. 50
14. शास्त्री, चतुरसेन, ‘गोली’, हिंद पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, आठवाँ पुनर्मुद्रण, पृ. 50
15. शर्मा, राम सनेही लाल, चतुरसेन शास्त्री : ऐतिहासिक और राजनीतिक कथाकार, निखिल पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, आगरा, प्रथम संस्करण 2014, पृ. 23
16. भाटी, हुकुमसिंह, मेड़तिया राठौड़ों का राजनीतिक और सामाजिक इतिहास, प्रकाशक – नारायण सिंह चावड़िया, हिम्मतनगर, गुजरात, प्रथम संस्करण 2014, पृ. 274
17. ओझा, गौरीशंकर हीराचंद, राजपूताने का इतिहास - Vol। III, Part II, वैदिक यंत्रालय, अजमेर में विक्रम संवत 1993 छपा, पृ. 188
18. आहूजा, डी. आर., राजस्थान : लोकसंस्कृति और साहित्य, नेशनल बुक ट्रस्ट, इण्डिया, पहला संस्करण 2002, पृ. 56
19. गुप्ता, मोहनलाल, ब्रिटिश शासन में राजपूताने की रोचक एवं ऐतिहासिक घटनाएं, प्रकाशक – हिंदी साहित्य मंदिर, जोधपुर, प्रथम संस्करण 2011, पृ. 187
20. शास्त्री, चतुरसेन, ‘गोली’, हिंद पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, आठवाँ पुनर्मुद्रण, पृ. 125
21. शर्मा, राम सनेही लाल, चतुरसेन शास्त्री : ऐतिहासिक और राजनीतिक कथाकार, निखिल पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, आगरा, प्रथम संस्करण 2014, पृ. 23-24


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