अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
12.06.2014


हाइकु

हुई है ठण्ड
देर से जागे सूर्य
किरणें ऊँघें।

बचा के खर्चे
सूर्य हुआ कंजूस
महँगी धूप।

सर्दी की धूप
सेंकती-भरमाती
लगती भली।

शीत ऋतु में
बारिश की बौछारें
चुभें शूल- सी!

सूर्य देवता
बादलों की ओट में
क्यों छिपे तुम?

सर्द लहर
ठिठुरती है काया
कहाँ हो धूप?

मेघ गर्जना
सर्द सोए दिन में
ज़रा ना भाए!

दिन सिहरा
बादलों की चादर
छिड़कें बूँदें।

गरजे मेघ,
सूरज भागा, छिपा
दूसरे देश।

चीखे बादल,
थर-थर काँपती
भोर है आई!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें