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ISSN 2292-9754

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01.14.2016


हम क्या बताएँ कैसे

हम क्या बताएँ कैसे गुज़रती है ज़िन्दगी
खा-खा के ठोकरों को सँवरती है ज़िन्दगी

पहरे बिठा रखे हैं ये मौसम ने हर तरफ़
उसको पता कहाँ कि बहकती है ज़िन्दगी

दिल में तिरे छुपा है जो उसकी तलाशकर
क्यों दर-ब-दर सुकूं को भटकती है ज़िन्दगी

जब से चलन दहेज़ का दुनिया में हो गया
पीड़ा, घुटन के साथ सुलगती है ज़िन्दगी

वो एक तितली फूल की गोदी में सो गई
तब जाना उसने कैसे महकती है ज़िन्दगी

उड़ते हैं जो ‘अनिरुद्ध’ ये आज़ाद परिन्दे
मस्ती में रोज़ इनकी गुज़रती है ज़िन्दगी


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