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03.15.2014


मनमीत

हाय री किस्मत-

बोल पर मेरे मत जाओ
अचानक मिले जो तुम,
चौंका दिया मुझे
आज पहली बार।

रोता बिलखता छोड़
जाने कहाँ गुम हो गए - निर्मोही।
आज साथ ले जाने को
इतने क्यों तत्पर?

जाने गिले - शिकवे कितने,
कितने किस्से अधूरे- कहने तुमसे।
कहाँ-कहाँ भटकता, ढूँढता
नहीं फिरा मैं।
कोई पता भी ना दिया
पूछूँ तो किससे पूछूँ ।
ना मुझे कोई यहाँ जानता,
ना तुम्हें कोई पहचानता,
कहो - कहाँ ओझल हो गए तुम?

मनमीत मेरे-
मैं ही जानता - कटे कैसे मेरे दिन रात।
वो निश्छल चेहरा तुम्हारा, वो कोमल स्पर्श
वो मीठे बोल, वो सपने सुहाने
समय की धार पर - सब धुलते गए।
जाने कितनों से मिला और कितनों से बिछड़ा
कितना संजोया, और लुटाया
कभी मुस्कुराता तो कभी पोंछता आँसू
जहाँ भी रहा - एक टीस सी रही
मन के अन्दर
और मन के कोने में
इंतज़ार तुम्हारा।

आँसुओं पर मेरे मत जाओ
मुझे ही नहीं मालूम
घुले हैं इनमें ना जाने
कितने खुशी और कितने ग़म।
देख तुम्हें आज अचानक यहाँ
इतराऊँ या कोसूँ क़िस्मत अपनी?
साथ अपने ले चलने का
कर रहे हो वादा या
फिर किसी और मेले में
छोड़ बिलखता-
ओझल होने का तो
नहीं कोई इरादा?


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