उनकी फ़ितरत ही जब बेवफ़ा हो गई ! डॉ. अनिल चड्डा
तुझपे मेरी ग़ज़ल आशना हो गई, अश्आर की तू तो खुदा हो गई ! शब हो या फिर शबनम की वेला रहे, सारी कायनात तुझपे फ़िदा हो गई ! हम थे पीते रहे जिसको मय मान के, एक दिन वो ग़मों की दवा हो गई ! जान गिरवी थी पहलू में जिसके मेरी, मौका पाते ही वो तो हवा हो गई ! दरो-दीवार पर सर पटकने से क्या, उनकी फ़ितरत ही जब बेवफ़ा हो गई