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05.03.2012
 

सोचते रहने से फ़तह कहाँ होती है!
डॉ. अनिल चड्डा


कभी तो बात की इन्तहा होती है,
बिन दीए, रौशनी कहाँ होती है !

चलते रहने से गुरेज़ न कर कभी,
वरना मंज़िलें तय कहाँ होती हैं !

कौन मिला है अपना कभी वीरानों में,
जुदाई वहीं, दोस्ती जहाँ होती है !

न अफ़सोस कर दिल के टूट जाने का,
ग़मीं वहीं, खुशियाँ जहाँ होती हैं !

दास्ताँ यूँ ही अधूरी न छोड़ अपनी,
सोचते रहने से फ़तह कहाँ होती है !


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