सोचते रहने से फ़तह कहाँ होती है! डॉ. अनिल चड्डा
कभी तो बात की इन्तहा होती है, बिन दीए, रौशनी कहाँ होती है ! चलते रहने से गुरेज़ न कर कभी, वरना मंज़िलें तय कहाँ होती हैं ! कौन मिला है अपना कभी वीरानों में, जुदाई वहीं, दोस्ती जहाँ होती है ! न अफ़सोस कर दिल के टूट जाने का, ग़मीं वहीं, खुशियाँ जहाँ होती हैं ! दास्ताँ यूँ ही अधूरी न छोड़ अपनी, सोचते रहने से फ़तह कहाँ होती है !