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09.30.2014


शुक्रिया जता कर एहसान..

शुक्रिया जता कर एहसान चुकता कर दिया,
दो ही लफ़्ज़ों में था हिसाब पूरा कर दिया!

शोर करते थे बहुत, कर देंगें ये, कर देंगें वो,
वक़्त पड़ने पर तो मुश्क़िलों को दूना कर दिया!

साज़िशों से भर चुकी राहों पे चलना था मुहाल,
तूने भी कर अलविदा, राहों को सूना कर दिया!

गौर फ़रमायेंगें क्या जो अपने में मशगूल हों,
आँसुओं ने ग़म को अपने थोड़ा हल्का कर दिया!

है ‘अनिल’ बर्बाद, अब आबाद क्या होना सनम,
अपनों ने बर्बादी में ख़ासा इजाफा कर दिया!


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