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05.03.2012
 

संभल न पाना आँचल का
डॉ. अनिल चड्डा


बिगड़ो न मस्त हवाओं पर, नहीं इनकी शैतानी है,
संभल न पाना आँचल का, यौवन कि निशानी है।

छुटे मुक्त हँसी बचपन की, और आँखें शर्माती हों,
तो समझो, हर मौसम पर भरपूर जवानी है।

पर, बोल गया चुपके से क्या कानों में बात कोई?
जब सोलह पूरे हो जायें, नहीं आँख मिलानी है।

संकोच में यूँ ही गँवाओगी, अपने जीवन को तुम,
फिर तरसोगी इस पल भर को, ये बात पुरानी है।

आओ बैठो, कुछ कह लूँ मैं, कुछ कह लो तुम भी अब,
ढलते सूरज की बेला है, और शाम सुहानी है।


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