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05.23.2017
 

नहीं मिलेंगी मंजिलें
डॉ. अनिल चड्डा


नहीं मिलेंगी मंजिलें, रहेंगें ग़र ज़ुदा-ज़ुदा,
हजार कोशिशें तू कर, नहीं मिलेगी पर फतह ।

सँभाल अपने होश तू,
सँभाल अपना जोश तू,
तू रात-दिन को एक कर,
अनेक को तू एक कर,
ये रात बीत जायेगी,
होगी फिर नई सुबह,
नहीं मिलेंगी मंजिलें, रहेंगें ग़र ज़ुदा-ज़ुदा,
हजार कोशिशें तू कर, नहीं मिलेगी पर फतह ।

बीत जायेगा समां,
रहेगा तू वहीं खड़ा,
जो कोशिशें करेगा तू,
कभी नहीं गिरेगा तू,
नहीं आग ग़र लगायेगा,
उठेगा कैसे फिर धुआँ ।
नहीं मिलेंगीं मंजिलें, रहेंगें ग़र ज़ुदा-ज़ुदा,
हजार कोशिशें तू कर, नहीं मिलेगी पर फतह ।

उठ, रौशनी बुला रही,
नई उमंग जगा रही,
अंधेरों में रहेगा,
तो करेगा कैसे जग नया,
जवानी है दौलत तेरी,
न इसको तू यूँ ही लुटा ।
नहीं मिलेंगीं मंजिलें, रहेंगें ग़र ज़ुदा-ज़ुदा,
हजार कोशिशें तू कर, नहीं मिलेगी पर फतह ।


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