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12.19.2014


मौत पास है खड़ी

मौत पास है खड़ी, फिर भी चालें चल रहे,
अपने ही कफ़न में, देखो खुद ही कीलें जड़ रहे !

कौन जानता है किसको पहले मौत आयेगी,
फिर भी सौ बरस का सारे हम सामान कर रहे !

दर्द और कहीं न था, दर्द और कहीं नहीं,
दोस्तों की दुनिया में, दर्द से हम मर रहे !

ख़ुद लिखी किताब के न अर्थ ढूँढ पाये हम,
पहचाने रास्तों पे बिन लक्ष्य के भटक रहे !

कौन सुन सकेगा मेरे दिल की धड़कनों को अब,
पत्थरों की दुनिया में, हम यूँ ही सर पटक रहे !


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