क्यों काँटे है चुभाता! डॉ. अनिल चड्डा
मेरा प्यार ग़र तुझपे कोई असर दिखाता, कभी तो तेरी आँख को नम कर जाता! दम भर के दोस्ती का, दुश्मनी निभाते रहे, दोस्त तो दुश्मनी में भी दोस्ती है निभाता! सुबह की रौशनी हमें कभी न मिली, न सही, शाम को तो मज़ार पर कोई दीया जलाता! जीवन के रेगिस्तान में, आँख में कण पड़ेंगे ही, कोई तो होता जो मेरी आँख सहला जाता! बाद मरने के ग़र मैय्यत पर फूल चढ़ाने हैं, तो फिर जीते जी क्यों काँटे है चुभाता!