अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.23.2017
 

कुछ तुम भूलो, कुछ वो भूलें
डॉ. अनिल चड्डा


गुज़री बातों को याद करो तो क्या मिलना है,
हर रोज ही तो इक बात नई से जी जलना है।

कितने छाले फोड़ोगे, दिल कितना छोड़ोगे,
खुशियों की सौगात को तुम कितना मोड़ोगे,
जीने को हालात के संग ही तो चलना है।

कुछ तुम भूलो, कुछ वो भूलें तो बात बनेगी,
ग़र थाम लो उसका हाथ, सुलभ हर राह कटेगी,
वर्ना ठोकर लगने से मुश्किल होगा सँभलना।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें