कुछ तुम भूलो, कुछ वो भूलें डॉ. अनिल चड्डा
गुज़री बातों को याद करो तो क्या मिलना है, हर रोज ही तो इक बात नई से जी जलना है। कितने छाले फोड़ोगे, दिल कितना छोड़ोगे, खुशियों की सौगात को तुम कितना मोड़ोगे, जीने को हालात के संग ही तो चलना है। कुछ तुम भूलो, कुछ वो भूलें तो बात बनेगी, ग़र थाम लो उसका हाथ, सुलभ हर राह कटेगी, वर्ना ठोकर लगने से मुश्किल होगा सँभलना।