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03.16.2014


कोमल सी हो

 कोमल सी हो तुम मधुप्रिये
मेरा पथ काँटों से भरा
साथ मेरा दोगी तुम कैसे
कभी है नभ से मिली धरा

पग-पग चलना हुआ है दूभर
व्यथित रहे बोझिल मन दिन भर
तपती धूप, है जलते पाँव
नहीं पता कहाँ मिलेगा ठाँव
यूँ तो तुम लगती हो मुझको
जीवन में शीतलमयी सुरा
पर सोचो तुम आज तलक
कभी है नभ से मिली धरा

दूर क्षितिज तक नजर दौड़ाएँ
स्वप्न इंद्रधनुषी नज़र में आएँ
पर उनको क्या पकड़ सकें हम
व्यर्थ वो हमको हैं तड़पाएँ
मैं हूँ सपना, तुम एक हक़ीक़त
साथ है अपना ज़रा-्ज़रा
आज तलक दुनिया में बोलो
कभी है नभ से मिली धरा


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