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05.03.2012
 

दिल तुम बिन डूबा जाता है !
डॉ. अनिल चड्डा


गलहार बनी है मनोव्यथा,
उर पाती नहीं लिख पाता है,
अँसुओं से भीगा अंतस तक,
मन कुछ भी कह नहीं पाता है ।

अब गौण बनी सब खुशियाँ हैं,
फूल लगें सब शूल से हैं,
गगन-धरा का मिलन कभी,
किसी को नहीं सुहाता है ।

प्रारब्ध से मैं तो हार गई,
मन ही में मन की बात रही,
पर जब तुम सामने होते हो,
मुँह जाने क्यों सिल जाता है ।

चिर उनींदी तरसें अँखियाँ,
सपने भी कैसे लूँ तेरे,
आभास हवा में हो तेरा,
मन भाव-शून्य हो जाता है ।

पलकों पर बोझ सहूँ कितना,
तुम आ कर मुझे बता जाते,
हर श्वास में तेरी गन्ध छिपी,
दिल तुम बिन डूबा जाता है ।


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