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05.23.2017
 

दौड़ है अँधी जीवन की
डॉ. अनिल चड्डा


जीवन तो चलता ही जाये, ज्यों उड़ जायें आ काले बादल,
कौन है जाने कल क्या होगा, सोच के तू क्यों है पागल।

कौन मिलेगा इन राहों में, सब कुछ पहले से तय है,
जीवन की मुश्किल राहों को, करना फिर भी तो तय है,
करते जाओ कर्म को अपने, हँस के करो या रो के करो,
सोच-सोच के फल की बाबत, आगे बढ़ने से न डरो,
सामना करने को दुनिया का, खोल ले तू मन की साँकल।

इस झूठी दुनिया में मुश्किल सच्चे लोगों का मिलना,
छोड़ो दुनिया के लोगों की, तुम तो सच्चे ही रहना,
बात पते की कहता हूँ मैं, सुनना चाहे न सुनना,
दौड़ है अँधी जीवन की, पर खाली हाथ ही तो मरना,
तृष्णा के पीछे लग कर न बन जाना तू यूँ ही जाहिल।


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