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02.27.2014


दर्पण के टुकड़े

टूट चुके
दर्पण के टुकड़ों को
सहेज कर
जोड़ने में
एक उम्र बीत जाती है
फिर भी दर्पण पहले जैसा
नहीं बन पाता
जाने क्यों
कोई समझ नहीं पाता
फिर भी
दर्पण के टुकड़े
करने में
लगे रहते हैं लोग -

दर्पण भावनाओं का
दर्पण विश्वास का
दर्पण रिश्तों का -
ये जीवन भी तो
दर्पण ही है
जिसके टुकड़ों पर
चलने से
लहूलुहान हो जाते हैं लोग
पर कोई
फिर से
जोड़ नहीं पाता
उन टुकड़ों को
फिर भी जाने क्यों
टुकड़े करने में
लगे रहते हैं लोग !
व्यस्त रहते हैं लोग !!


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