|
दर्पण में
कई बार
अपना चेहरा
बिखरते हुए
देखा है मैंने
विकृत हो रही भावनाएँ
जब
विद्रूप हँसी में
बदल कर
आवरण सा बना लेती हैं
मेरे मन के आसपास
और
लावा सा उगलने लगती हैं
ये आँखें भी
तो
झुर्रियों के बीच
कहीं फँसी हुई
नज़र आती हैं
मेरी अतृप्त तृष्णाएँ
और
एक-एक कर
चटकती जाती हैं
ये बुढ़ा गईं हड्डियाँ
तो
आभास होने लगता है
एक बिखरते हुए चेहरे का
एक बार फिर
जिस पर
आँखों से उगलता लावा
तह लगाता रहा है
परत-दर-परत
और मैं
हौले से जब
खुरचना चाहता हूँ
एक जमी हुई पपड़ी
तो
उड़ जाती है
एक मक्खी
भिनभिना कर
मेरी अवशता का
उपहास उड़ाती हुई !
|