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09.23.2014


आज के गुरू

आज के गुरू, गरु-घंटाल हो गये,
देश के लिये वो एक सवाल हो गये ।

बात मूल्यों की करें,
पर गर्त में पड़े हैं ख़ुद।
सीख दूसरों को वो दे,
और जुर्म कर रहे हैं ख़ुद॥
संस्कारों से तो वो कंगाल हो गये।

त्याग क्या करेंगें वो,
अहम् से जो सने हुए।
चुपके-चुपके सब करें,
निर्दोष हैं बने हुए॥
समाज के लिये तो वो जंजाल हो गये।

गुरू हमारे ऐसे हैं,
तो शिष्य क्या बन पायेंगे,
देश के भविष्य को,
पाताल में ले जायेंगे,
मार्गदर्शक आज के चांडाल हो गये!


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