डॉ. अनिल चड्डा


कविता
अवशता
आज के गुरू
कुछ तुम भूलो, कुछ वो भूलें
कोमल सी हो
जीवन का ज्ञान
तेरे अधर !
दर्पण के टुकड़े
दिल तुम बिन डूबा जाता है !
दौड़ है अँधी जीवन की
नहीं मिलेंगी मंजिलें
पीड़ा से लिया जोड़ है नाता !
बेचारा हूँ
मेरे बिन तुम कहाँ हो
दीवान
आज के विद्वान्
आसाँ सा काम
उनकी फ़ितरत ही जब ...
उनके लिये तो वो होली ...
कौन मरना चाहता है
क्यों काँटे है चुभाता!
ख़ुदा अपना भी तो है यारो !
ख़्वाब आते रहे!
ज़माने में धुँआ कैसा हुआ है
जो ख़ुद टूटते हैं
मेरी लाडली
मैं दर्द पिया करता हूँ !
मौत पास है खड़ी
शुक्रिया जता कर एहसान..
संभल न पाना आँचल का
सात जन्मों के रिश्ते निभाते रहे
सोचते रहने से फ़तह कहाँ...