अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.16.2016


विद्रोही

 देख चुका हूँ
इन स्वर्ण महलों की सच्चाई।
रक्त नहाई दीवारें और
दंभ भरी हैं परछाईं।

जानता हूँ कैसे हुई हैं रातें रोशन
कहाँ से होकर ये रोशनी आई।
कोटि-कोटि दीप बुझे होंगे
ख़ाक हुई होंगी कोटि तरुणाई।

टूटे होंगे कोटि सपने
छूटे होंगे बंधु सुत अपने।
ओह! रोई होंगी कितनी आँखें?
निकली होंगी कितनी आँहें?

भूखे नंगे सिमटे जिस्मों की
ओह! कितनी सारी मौन कराहें?
दबी पड़ी हैं इन जंगलों में
ऊँचे चौड़े इन बंगलों में।

रक्तरंजित इन अट्टलिकाओं पर
मैं पग धरता हूँ।
हाँ-हाँ विद्रोही हूँ
मैं विद्रोह करता हूँ।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें