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10.20.2007
 
ना राधा ना रुक्मणि
अमृता प्रीतम
(प्रेषक - डॉ. शैलजा सक्सेना)

        एक...दो...तीन...चार....पाँच...

        बालकेश्वर रोड की सन राइज़इमारत के व्हाइट हाउस कम्पाउण्डकी सीढ़ियाँ उतरते हुए हरिकृष्ण का पैर पाँचवीं सीढ़ी पर रुक गया...

        रुक गया नहीं; ठिठक गया...

        सामने आसमान के हाथ में दूध का कटोरा थमा हुआ था और कटोरे से छलककर दूध उसके पैरों पर के आगे की सीढ़ियों पर बिखरा हुआ था...

        वह जैसे गिरे हुए दूध पर पैर रखने से ठिठक गया....       

        हरकृष्ण के पैर कुछ लड़खड़ाये, लेकिन सामने वाली सीढ़ियाँ सपाट होकर फर्श बन गईं..

        उसने पहचाना...यह चर्च गेट वाला जयदेव का कमरा है। कमरे में जयदेव भी है, साहिर भी और वह स्वयं भी...बाजार के नुक्कड़ वाली पान की दुकान वाला पूरबिया राम आसरे, दूध से भरी एक बाल्टी लेकर कमरे की चौखट पर आ बैठा है...

        जयदेव बता रहा है - आज शिवरात्रि है। इमारत के सारे घरों के नौकर पूरबिये हैं। बाहर सड़क की छोटी-छोटी दुकानों वाले भी पूरबिये है। आज सवेरे उन्होंने सारे घरों से उगाही की थी। मुझसे भी दस रुपये ले गए थे...उन सबने मिलकर भंग घोटी है, भंग में दूध, चारों मगज, बादाम और इलायची भी डाली है...वही भंग वाला दूध अब राम आसरे सबको पिला रहा है...।

        और हरेकृष्ण ने देखा - जयदेव ने बालटी में से तीन गिलास भरे हैं, जिनमें से एक गिलास साहिर पी रहा है, एक जयदेव, और एक गिलास उसके अपने हाथ में है...

        और उसे अन्दर ही अन्दर एक चक्कर सा आने लगा, वह उठकर खड़ा हो गया है, लेकिन सामने कमरे की चौखट के पास, जहाँ राम आसरे ने दूध की बाल्टी रखी थी, वहाँ कितना ही सारा दूध बिखरा हुआ है...

        वह कमरे से उठकर, अपने घर वापस जाना चाहता है, लेकिन उसके पैर रुक गये...वह गिरे हुए दूध पर पैर रखने से ठिठक-सा गया है...

        एक..दो...तीन...चार...पाँच की गिनती करते हुए हरकृष्ण पाँचवी सीढ़ी पर खड़ा हो गया था। फिर न जाने कब उसके पैर छठी सीढ़ी पर पड़कर आगे सातवीं...आठवीं...नौवीं सीढ़ी भी उतरने लगे....

        अब सीढ़ियों की गिनती वह चेतन मन से नहीं कर रहा था, पर अचेत मन से शायद कर रहा था, कि वह गिनती जब बीस के आँकड़े पर पहुँची तो हरकृष्ण को याद आया .... उसने जिंदगी में सिर्फ एक बार भंग पी थी, वही जयदेव के कमरे में, और उस बात को आज बीस वर्ष हो चुके थे...

        हरकृष्ण को हँसी आ गई, और शीघ्र ही याद आया कि उस दिन वह टैक्सी लेकर घर पहुँचा। जयदेव के कमरे से बाहर आते ही उसे लगा कि उसके पैर लड़खड़ा रहे थे, कलेजे में घुटन सी हो रही थी, और उसे लगा था कि आज वह पैदल चलकर घर नहीं जा सकेगा....

        टैक्सी के मीटर पर कितने पैसे लिखे हुए थे, उसने पढ़ने की कोशिश की थी, पर आँखों के आगे मीटर के नम्बर गोल-गोल घूमने लगे थे...और उसने पैसों की गिनती से पीछा छुड़ाकर एक दस रुपये का नोट टैक्सी वाले को थमा दिया था। उसने नोट लेकर कुछ पैसे उसे लौटाए थे, पर उसने गिने नहीं थे, मुट्ठी में लेकर जेब में डाल लिए थे...और मुट्ठी में कोई सिक्का खनककर नीचे सड़क पर गिर पड़ा था, जिसे ढूँढने के लिए वह सड़क पर खड़ा नहीं रहा था..

        उसे आज तक याद है कि जेब से चाभी निकाल कर उसने अपने कमरे का ताला खोला था, लेकिन लगा था कि ताला चाभी से नहीं खुला, वह पहले से ही खुला हुआ था...

        और उसके मन में से एक खौफ़ सा उठकर उसके सिर को चढ़ गया था कि कमरे में से किसी ने उसके रंग चुरा लिये थे...

        कमरे में पूरे एक सौ डिब्बे रंगों के थे, जो वह यूरोप से खरीद कर लाया था और एक-एक डिब्बे में रंगों की तीन-तीन ट्‍यूबें थीं...पूरी तीन सौ ट्‍यूबें...

        वह कमरे में पैर रखते ही घबरा कर वे ट्‍यूबें गिनने लगा था...

        गिनती न जाने कब बीच राह में से उखड़ जाती थी कि वह चालीस, पचास या सौ तक गिनकर, फिर शुरू से गिनने लगता था...

        और उस रात वह पता नहीं रात के किस समय तक रंगों की ट्‍यूबें गिनता रहा था....

        बड़ी अजीब रात थी। एक दहशत चारों तरफ रात के अंधेरे की तरह फैली हुई थी कि उसके रंग कोई चुरा कर ले गया है....

        और उसके अगले दिन हरकृष्ण को सुबह की रोशनी जैसी हँसी आई कि उसने जिंदगी में सिर्फ एक ही बार भंग पी है, एक ही गिलास, उसका यह हाल हो गया है, शिवजी भगवान जो रोज़ भंग पीते हैं, उनका न जाने क्या हाल होता है...

        और साथ ही ख्याल आया कि जयदेव और साहिर का हाल भी देखना चाहिए...

        शाम को वह दोनों का हाल देखने गया था। पता लगा कि पिछली रात जयदेव अपने सामने अपना हार्मोनियम रखकर कोई दो घंटे सा रे गा मा पा धा नी सा करता रहा था, और आखिर में उसके सामने से हार्मोनियम उठाकर उसे वहीं गद्दे पर लिटा कर कमरे का दरवाजा बन्द कर दिया था।

         पता लगा कि साहिर जब अपनी कार में अपने घर गया, तो चार बंगला वाले अपने कम्पाउण्ड में कोई एक घंटा कार चलाता रहा। कम्पाउण्ड का एक चक्कर जब पूरा हो जाता, उसकी गाड़ी दूसरे चक्कर में पड़ जाती। और कोई एक घंटे बाद जब उसकी माँ ने बड़ी मुश्किल से कार के आगे खड़े होकर उसकी कार रोकी, तो वह कार से उतरकर, पैदल उस कम्पाउण्ड के चक्कर लगाने लगा था...उसकी माँ ने बड़ी मुश्किल से उसका हाथ पकड़ उसे घर के दरवाजे के आगे रोका था, और फिर हाथ पकड़कर उसे घर के अन्दर ले गई थी....

        ओ खुदाया! हरकृष्ण को अब भी वह बीस वर्ष पहले की बात याद करके हँसी आ गई कि भंग वाले दूध के गिलास का कैसा असर था कि साहिर उस स्पेस के एक दायरे में कैद हो गया था जयदेव सारे रागों को भूलकर सिर्फ सा रे गा मा के अलाप में खो गया था, और वह रात भर स्वयं रंगों की चोरी के भय से गुच्छा-सा होकर बैठा रहा था...

        हरकृष्ण की चेतना जब बीस बरस पीछे वाली घटना से इधर की ओर आई, तो उसे यकीन हो गया कि सामने आसमान के हाथ में जो दूध का कटोरा है, वह भंग वाले दूध का है....

        एक-एक कदम सीढ़ियाँ उतरते हुए हरकृष्ण ख्यालों की सीढ़ियाँ भी उतरने लगा कि यह आसमान कब से भंग वाला दूध पीने लगा है।

        और अपने अन्दर से ही उसे अहसास हुआ कि शायद पाँच या छ: बरस हो गये हैं, जब से लग रहा है कि हर महीने जब आसमान अपने दोनों हाथों में ऊपर तक भरा हुआ दूध का कटोरा थामता है और कटोरे का दूध छलक कर जब धरती पर बिखरता है, तो न जाने उसकी कैसी छींटें उसके बदन पर पड़ जाती हैं कि उसके अंगों पर एक दीवानगी तारी हो जाती है....

        सो आसमान कोई छ: बरस से हर महीने भंग वाला दूध पीने और छलकाने लगा है...

        और हर महीने पूर्णिमा की रात उसके प्राण उसके बस में नहीं रहते....

2

        कमरे के दरवाजे से लगी हुई बाईं ओर की भीतरी दीवार पर बिजली का बटन था, जिसे हरकृष्ण ने तीन बार दबाया लेकिन कमरे में उसी तरह अंधेरा रहा। इस समय बिजली शायद पीछे से नहीं थी।

        कमरे का दरवाजा उढ़का कर हरकृष्ण ने उसके कुंडे को टटोला और कुंडा लगाकर, अटकल से सामने की दीवार की ओर चला, जहाँ लम्बा सा फट्टा बिछाकर उसने फट्टे को सोने की जगह बनाया हुआ था....

        अचानक कानों में किसी गड्‍डे के चीखते हुए पहियों की आवाज पड़ी...

        कमरे में रोशनी नहीं थी, तब भी उस दरवाजे की ओर, बाहर बगीचे की ओर खुलने वाली खिड़की की ओर देखा...जैसे बाहर, उसकी खिड़की के सामने से कोई गड्‍डा गुजर रहा हो...

        उसे साफ तौर पर याद आया.. कि बालकेश्वर रोड वाली इस इमारत में 75 सीढ़ियाँ उतरकर, उसका यह कमरा, किसी सड़क के साथ नहीं लगता। कमरे के सामने और बाएँ हाथ पर सिर्फ एक बड़ा सा वीरान बगीच है, जिसके साथ तीन फुट ऊँची पत्थरों की दीवार लगती है, और उसके परे सिर्फ समुद्र है...

        लेकिन गड्‍डे के चीखते हुए पहियों की आवाज अभी भी आ रही थी...

        अंधेरे में चारपाई को टटोलते हुए उसका हाथ अचानक गड्‍डे की पट्टी पर पड़ गया...

        गड्‍डा उसी तरह अपनी धीमी चाल से चला जा रहा था। वह भी गड्‍डे के साथ-साथ चलने लगा...

        उसे इतमीनान का एक साँस आया, कि आखिर सारी रात की मेहनत सफल हुई है....

        बहुत ही थोड़ा समय रह गया था,जब उसे पता लगा कि बम्बई आर्ट सोसायटी की नुमाइश होने वाली है। उसने दिन-रात एक करके अपनी एक पेंटिंग बनाई थी जिसमे एक बैल रस्सा तुड़ा कर भाग रहा है और लोग उसके इर्द-गिर्द दौड़ कर, उसे घेर कर पकड़ लेना चाहते हैं -

        इस पेंटिंग का उसने नाम रखा या - रिबैलियन।



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