|
आज कहूँ मैं वारस शाह से
अमृता प्रीतम
(अनुवाद
- निर्मल सिद्धू)
आज कहूँ वारस शाह से
,
कहीं कब्रों से ही
बोल
आज किताबे इश्क का,
कोई अगला
पन्ना खोल
एक बेटी रोई थी पंजाब की,
तूने
लिख-लिख बैन मारे
आज लाखों बेटियाँ रोतीं,
वारस शाह तुझे
फिर से पुकारें
उठ दर्दमन्दों के अय दर्दिया,
उठ देख अपना
पंजाब
हर तरफ बिछीं हैं लाशें,
है लहू से भरी
चिनाब
किसी ने पाँचों पानी में,
दिया है ज़हर
मिला
फिर उन पानी ने सारी धरती
को सींच दिया ।
इस उपजाऊ
धरती के,
रोम रोम फैला
गया ज़हर
चप्पे चप्पे में ख्ïन
की लाली,
बिछ गया ज़र्रे
ज़र्रे में क़हर
विषैली हवायें हैं अब,
खेत खेत में
बहती जायें
हर एक बाँस की बंसी को जो सर्प
बनाती जायें
सर्पों के बस हुए लोग - मुख में केवल
डंक ही डंक
पल भर में ही पंजाब के,
नीले पड़ गये
अंग
टूटे गले से गीत फिर,
तकले से टूटी
डोर
त्रिंजनों से बिछड़ी सहेलियाँ,
चरखे का बन्द
हो गया शोर
आज माँझी ने खुद किश्ती को,
डुबो दिया है
सेज समेत
आज पीपल ने स्वयं झूलों को,
तोड़ दिया है
डाल समेत
जहाँ बजती थी फूँक प्यार की,
वह बंसी गई है
खो
भाई रांझे के आज सब,
भूल गये हैं
प्यार मुहब्बत को
धरती पर है लहू बसा,
क़बरों से रक्त
है चोये
प्रीत की राजकुमारियाँ,
आज मज़ारों पर
हैं रोये
आज सब हैं कैदों बन गये,
हुस्न इश्क़ के
चोर
ढूँढ के लायें कहाँ से आज,
वारस शाह एक
और.....
आज कहूँ वारस शाह से
,
कहीं कब्रों से ही
बोल
आज किताबे इश्क का,
कोई अगला
पन्ना खोल
त्रिंजन- सामूहिक चरखा कातने वाली सहेलियाँ
कैदों - हीर का मामा जो कि हीर-राँझे के प्रेम का विरोधी था
|
अज
आखाँ वारस शाह नूँ
अमृता
प्रीतम
अज आखाँ वारस शाह नूँ,
कितों कबराँ
विच्चों बोल।
ते अज किताबे इश्क़ दा,
कोई अगरा वरका
फोल।
इक रोई सी धी पंजाब दी,
त्¡
लिख लिख मारे
वैण,
अज लक्खाँ धीयाँ रोंदियाँ,
तैनूँ
वारस शाह नूँ
कैहण।
उठ दरदमंदाँ दिआ दरदीया! उठ तक्क अपणा पंजाब
अज बेले लाशाँ विछियाँ,
ते लहू दी भरी
चनाब।
किसे ने पंजाँ पाणियाँ,
विच्च दित्ती
ज़हिर रला
ते उन्नाँ पाणियाँ धरत नूँ,
दित्ता पाणी
ला।
इस ज़रख़ेज़ ज़मीन दे,
लूँ
लूँ
फुटिया ज़हिर।
गिठ गिठ चढ़िआँ लालिआँ,
फुट फुट चढ़िया
कहिर
विहु-वलिस्सी वा फिर,
वण वण वगी जा
उहने हर इक वाँस दी वँझली,
दित्ती नाग
बणा।
नागाँ कीले लोक-मुँह बस डंग ही डंग
पलो पली पंजाब दे,
नीले पै गए
अंग
गलिओं टुट्टे गीत फिर,
तकलिओं टुट्टी
तंद
त्रिंजणों टुट्टियाँ सहेलियाँ,
चरखड़े घुकर
बंद
सणे सेज दे बेड़ियाँ लुड्डण दित्तीयाँ रोढ़
सणे डालियाँ पींघ अज,
पिपलाँ दित्ती
तोड़
जिथे वजदी सी फूक पिआर दी,
उह वँझली गई
गुआच
राँझे दे सब वीर अज,
भ्îल
गए उहदी जाच
धरती ते लहू वसिआ,
कबरां पईआँ
चोण
प्रीत दीआँ शहज़ादियाँ अज विच्च मज़ाराँ रोण
अज सभे कैदों बण गए,
हुसन इशक़ दे
चोर
अज किथों लिआइए लभ के,
वारस शाह इक
होर
अज आखाँ वारस
शाह नूँ,
कितों कबराँ
विच्चों बोल।
ते अज किताबे इश्क़ दा,
कोई
अगरा वरका फोल।
|