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10.20.2007
 

आज कहूँ मैं वारस शाह से
अमृता प्रीतम

(अनुवाद - निर्मल सिद्धू)

आज कहूँ  वारस शाह से , कहीं कब्रों से ही बोल
आज किताबे इश्क का
, कोई अगला पन्ना खोल
एक बेटी रोई थी पंजाब की
, तूने  लिख-लिख बैन मारे
आज लाखों बेटियाँ रोतीं
, वारस शाह तुझे फिर से पुकारें
उठ दर्दमन्दों के अय दर्दिया
, उठ देख अपना पंजाब
हर तरफ बिछीं हैं लाशें
, है लहू से भरी चिनाब
किसी ने पाँचों पानी में
, दिया है ज़हर मिला
फिर उन पानी ने  सारी धरती  को सींच दिया ।
इस उपजाऊ
धरती के, रोम रोम फैला गया ज़हर
चप्पे चप्पे में ख्
ïन की लाली, बिछ गया ज़र्रे ज़र्रे में क़हर
विषैली हवायें  हैं अब
, खेत खेत में बहती जायें
हर एक बाँस की बंसी को जो सर्प
बनाती जायें
सर्पों के बस हुए लोग -  मुख में केवल डंक ही डंक
पल भर में ही पंजाब के
, नीले पड़ गये अंग
टूटे गले से गीत फिर
, तकले से टूटी डोर
त्रिंजनों से बिछड़ी सहेलियाँ
, चरखे का बन्द हो गया शोर
आज माँझी ने खुद किश्ती को
, डुबो दिया है सेज समेत
आज पीपल ने स्वयं झूलों को
, तोड़ दिया है डाल समेत
जहाँ बजती थी फूँक प्यार की
, वह बंसी गई है खो
भाई रांझे के आज सब
, भूल गये हैं प्यार मुहब्बत को
धरती पर है लहू बसा
, क़बरों से रक्त है चोये
प्रीत की राजकुमारियाँ
, आज मज़ारों पर हैं रोये
आज सब हैं कैदों बन गये
, हुस्न इश्क़ के चोर
ढूँढ के लायें कहाँ से आज
, वारस शाह एक और.....
आज कहूँ  वारस शाह से
, कहीं कब्रों से ही बोल
आज किताबे इश्क का
, कोई अगला पन्ना खोल

त्रिंजन- सामूहिक चरखा कातने वाली सहेलियाँ
कैदों - हीर का मामा जो कि हीर-राँझे के प्रेम का विरोधी था

अज आखाँ वारस शाह नूँ
अमृता प्रीतम  


अज आखाँ वारस शाह नूँ, कितों कबराँ विच्चों बोल।
ते अज किताबे इश्क़ दा
, कोई अगरा वरका फोल।
इक रोई सी धी पंजाब दी
, त्¡ लिख लिख मारे वैण,
अज लक्खाँ धीयाँ रोंदियाँ
, तैनूँ वारस शाह नूँ कैहण।
उठ दरदमंदाँ दिआ दरदीया! उठ तक्क अपणा पंजाब
अज बेले लाशाँ विछियाँ
, ते लहू दी भरी चनाब।
किसे ने पंजाँ पाणियाँ
, विच्च दित्ती ज़हिर रला
ते उन्नाँ पाणियाँ धरत नूँ
, दित्ता पाणी ला।
इस ज़रख़ेज़ ज़मीन दे
, लूँ लूँ फुटिया ज़हिर।
गिठ गिठ चढ़िआँ लालिआँ
, फुट फुट चढ़िया कहिर
विहु-वलिस्सी वा फिर
, वण वण वगी जा
उहने हर इक वाँस दी वँझली
, दित्ती नाग बणा।
नागाँ कीले लोक-मुँह बस डंग ही डंग
पलो पली पंजाब दे
, नीले पै गए अंग
गलिओं टुट्टे गीत फिर
, तकलिओं टुट्टी तंद
त्रिंजणों टुट्टियाँ सहेलियाँ
, चरखड़े घुकर बंद
सणे सेज दे बेड़ियाँ लुड्‍डण दित्तीयाँ रोढ़
सणे डालियाँ पींघ अज
, पिपलाँ दित्ती तोड़
जिथे वजदी सी फूक पिआर दी
, उह वँझली गई गुआच
राँझे दे सब वीर अज
, भ्îल गए उहदी जाच
धरती ते लहू वसिआ
, कबरां पईआँ चोण
प्रीत दीआँ शहज़ादियाँ अज विच्च मज़ाराँ रोण
अज सभे कैदों बण गए
, हुसन इशक़ दे चोर
अज किथों लिआइए लभ के
, वारस शाह इक होर
अज आखाँ वारस शाह नूँ, कितों कबराँ विच्चों बोल।

ते अज किताबे इश्क़ दा, कोई अगरा वरका फोल।



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