अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
01.17.2016


पश्चाताप

बड़ी भाग-दौड़ व पैरवी-पैगाम के बाद निलय का स्थानान्तरण होशियारपुर से महुआ चौक, खड़हड़ा के लिये हुआ था। इस स्थानान्तरण के लिये उसने कहाँ-कहाँ पैसे खर्च नहीं किये। बीसियों मर्तबा हाईयर ऑथोरिटी की जी-हुज़ूरी करनी पड़ी उसे। एक चपरासी से लेकर बाबू-साहब तक के दरवाज़े खटखटाने पड़े। इतनी जद्दोज़हद के बाद भी उसका स्थानान्तरण महुआ चौक, खड़हड़ा संभव हो पएगा, विश्वास न था। विभाग की ओर से किसी तरह का रिस्पॉन्स नहीं लिये जाने की वज़ह से वह उदास हो चुका था। धीरे-धीरे अपना पेशेंन्स भी खोने लगा था वह। अचानक एक दिन उसके हाथ स्थानान्तरण की चिट्ठी प्राप्त हुई। वह ख़ुशी से पागल हो उठा। ऊपर वाले ने उसकी सुन ली, परमात्मा लाख-लाख तेरा धन्यवाद! काफ़ी दिनों तक होशियारपुर में रहते-रहते उसका मन ऊब चुका था। एक ग़ैर मर्द के साथ पत्नी सरला की लगातार बढ़ रही घनिष्टता उसकी चिन्ता की सबसे बड़ी वज़ह थी। उसके भावी जीवन में एक बड़े भूचाल की आशंकाएँ दिन-ब-दिन बलवती होती जा रही थीं।

लघु सिचाई विभाग, होशियारपुर में सीनियर ड्राफटमेन के पद पर क़ाबिज़ था निलय। वेतन के अलावा ऊपरी आमदनी भी अच्छी थी, किन्तु मेहनत दिन-रात का। फ़ुर्सत का क्षण मानो उससे कोसों दूर था। घर पर पत्नी व बच्चों का समय कैसे व्यतीत हो रहा होगा, कब किसे किस चीज़ की दरकार हो रही होगी, घर पर किसकी आवाजाही कब और किस रूप में हो रही होगी, सर्वथा इससे अनभिज्ञ रहता। रिंकी व पुष्पा पापा के प्यार भरे चुम्बन को तरस जातीं। निलय करता भी तो क्या? जीवन में सिर्फ़ प्यार-मुहब्बत से ही पेट भरने वाला नहीं? पैसे बहुत महत्वपूर्ण होते हैं आगे बढ़ने के लिये। पैसे न हों तो, अपने भी बुरा-भला कहने से चूकते नहीं। गाँव में रहने वाले बूढ़े माता-पिता व बहनों के अलावा कई अन्य रिश्तेदारों की तक़रीबन सारी जबावदेही उसे ही निभानी पड़ रही थी। दो छोटी-छोटी बहनें अभी तक अनब्याही थीं। पढ़ने-लिखने से लेकर तमाम तरह की सुविधाओं का ख़्याल उसे ही रखना पड़ता था। लड़कियों की अधिक उम्र से गाँव-देहात में छींटाकशी के अप्रत्यक्ष प्रहार भी झेलने पड़ते हैं। यह दिगर बात थी कि निलय की बहनें उम्र की उस दहलीज़ तक नहीं पहुँचीं थीं, जिसकी वज़ह से माता-पिता/अभिभावकों को शादी-ब्याह के मामले में शर्मसार होना पड़े। पति की परेशानियों से सरला अबूझ नहीं थी। तमाम तरह की समस्याओं/परेशानियों के बीच पति के सुख-दुःख का ख़्याल रखना उसका परम कर्तव्य था। इतना अवश्य था कि सिर्फ़ पैसों के पीछे किसी इंसान का भागना सरला के आचरण व सिद्धान्त के ख़िलाफ़ था, किन्तु करे भी तो क्या? निलय को समझाना टेढ़ी खीर साबित हो रही थी।

पापा के प्यार व चुंबन के लिये तरसती बच्चियों को बहला-फुसला कर रखना सरला की शायद नियति बन चुकी थी। उसे ज्ञात था, बच्चियों की परेशानियों से पति को अवगत कराने पर खरी-खोटी उसे ही सुननी पड़ेगी। इन सब बातों के लिये निलय से बात करना व्यर्थ था। तमाम बातों का एक ही जबाव हुआ करता, आख़िर किस बात की कमी है, पैसे कमाता हूँ किसके लिये? सारे पैसे ख़ुद ही तो नहीं डकार जाता? पैसे तुम्हें ही तो देता हूँ, फिर मनमुटाव किस बात की? बच्चों की देखभाल माँ ही तो किया करती है?

(2)

सरला समझ चुकी थी निलय से बहस करने का अर्थ ढेंकी से सर टकराना है। आपसी झड़प से बेवज़ह तनाव की स्थिति बनी रहेगी। इससे जहाँ एक ओर उसका दाम्पत्य जीवन प्रभावित होगा, वहीं इसका प्रभाव बच्चों पर भी पड़ेगा। सैकड़ों मील दूर गाँव में रह रहे सास-ससुर व ननदों को क्या पता कि शहर में उसका अपना जीवन किन-किन शर्तों की बुनियाद पर टिका है? बूढ़े सास-ससुर को जब इस बात का इल्म होगा तो उन्हें भी तकलीफ़ होगी। घर की बात बाहर जाने से लोग हँसेंगे मज़ाक उड़ाएँगे। उपरोक्त का मन ही मन मंथन करती सरला मुँह बन्द रखने में ही अपनी भलाई समझ रही थी। समय किसी का इन्तज़ार नहीं करता। निर्धारित गति से अपने गन्तव्य तक वह आगे बढ़ता ही जाता है। पुरुषों की तुलना में महिलाएँ जल्द अपनी युवावस्था को प्राप्त कर लेती हैं, निलय की दोनों बहनें कब विवाह योग्य हो गईं, पता ही नहीं चला। दो-दो बहनों की शादी व माँ-बाप की मौत के बाद उनके श्राद्धकर्म से ऊबर चुका निलय अपनी थकान मिटा रहा था। रिंकी व पुष्पा भी पहले से बड़ी व समझदार हो चुकी थीं। पापा को तंग करने की आदतें उनके मन से जाती रही। बच्चियाँ अपनी पढ़ाई मे व्यस्त रहने लगीं। बच्चियों के रिज़ल्ट से सरला काफ़ी प्रभावित थी। घर-गृहस्थी ठीक-ठाक चल रहा था। आख़िर यह सब हो भी क्यों न? एशो-आराम की कोई वस्तु नहीं बची थी, जिसकी कमी का दंश झेलना पड़ रहा हो। दैनिक जीवन के उपयोग की तमाम वस्तुओं के अलावा विलासिता की सारी सुविधाएँ मौजूद थीं। क्वार्टर भी अच्छा-ख़ासा था। आस-पड़ोस में रहने वाले लोग भी भोले-भाले व शिष्ट आचरणी थे। पूरी कॉलोनी एक परिवार की तरह था। अपने सरल व्यवहार व दूसरों के सुख-दुःख में शरीक रहने वाली सरला काफ़ी लोकप्रिय थी कॉलोनी में। नाम के अनुरूप उसमें मौजूद थे रूप व गुण। आनन्द, विषाद के क्षणों में कॉलोनी की महिलाओं का पहला हक़ सरला पर ही बनता था। उधार-पैंचा की बात हो या फिर अन्य सहयोग की बात, बढ़-चढ़ कर भाग लिया करती थी इनमें। बच्चों को स्कूल भेजने व दिन भर के काम से फ़ारिग होने के बाद पड़ोसियों के सुख-दुःख में ही गुज़रा करता उसका अधिकांश वक़्त।

घर-गृहस्थी के कार्यों से फ़ारिग हो महिलाएँ अक्सर एक-दूसरे की आपबीती व खट्टे-मीठे अनुभवों से रूबरू होने का प्रयास नहीं छोड़तीं। आपसी रिश्तों में कटुता हो, प्यार-मुहब्बत या फिर आर्थिक तंगी की हालत। खुलकर एक-दूसरे के बीच अपनी-अपनी बातें रखने से उनमें आत्मीय संतुष्टि की प्राप्ति होती है। जो अपने से प्रतीत होते हैं, उनके बीच दिल की बातें उघारकर रख दी जाती हैं। एक-दूसरे के हिस्से में प्राप्त दुःख-दर्द में शामिल होकर महिलाएँ ख़ुद को तब काफ़ी तनावमुक्त पाती हैं। जिस क्वार्टर में बच्चों के साथ सरला रहा करती थी, मात्र 50-60 मीटर की दूरी पर पत्नी व बच्चों के साथ गायकवाड़ जी निवास करते थे। गायकवाड़ जी किसी दूसरे विभाग में एक अच्छे ओहदे पर क़ाबिज़ थे। उनकी पत्नी मिताली गायकवाड़ से सरला की कुछ ज़्यादा ही बनती। उम्र व अनुभव में वे जो बड़ी ठहरी। यही कारण था सरला के घर के पल-पल की ख़बर से मिताली गायकवाड़ रूबरू थीं। औरतें चाहे जितने बड़े ख़ानदान से ताल्लुक़ रखती हों, शंकाओं से ख़ुद को अलग नहीं कर पातीं। मिताली गायकवाड़ सामान्य महिलाओं से ज़्यादा होशियार व तेज़-तर्रार थीं। दूसरे घरों की समस्याओं को सुनने व उस पर अपना पक्ष रखने में उन्हें जो ख़ुशी मिलती वर्णन नहीं किया जा सकता। पड़ोसियों से बातचीत के दरम्यान गायकवाड़ जी की चर्चा और उनकी बड़ाई करना उनका शग़ल बन चुका था। दूसरी महिलाओं के पेट की बातें लेना व उस पर अपना असंवैधानिक कमेंट देना पड़ोस की दूसरी कुछ महिलाओं के गले नहीं उतर रहा था।

(3)

इस तरह जहाँ एक ओर सरला के लिये वह आदरणीय थीं, वहीं दूसरी ओर कई-कई महिलाओं के बीच कम अलोकप्रिय भी नहीं। दूसरे के घरों में जिन महिलाओं को दख़लंदाज़ी की आदतें नहीं होतीं, मिताली गायकवाड़ की उनसे नहीं पटती। अपने पतिदेव की गुणगान व निलय के विरुद्ध सरला के मन में घृणा का वातावरण बनाए रखना मिताली गायकवाड़ की सबसे बड़ी कमज़ोरी थी। उठना-बैठना, खाना-पीना यहाँ तक कि तमाम कार्यों में पत्नी से सहमत हुए बिना गायकवाड़ जी कोई क़दम नहीं उठाते, सरला को जलाने के लिये ऐसा मंत्र वे समय-असमय अलापती रहतीं। निलय के विरुद्ध सरला को बरगलाने के पीछे उनका क्या मक़सद रहा होगा, किसी को कुछ भी पता नहीं। पड़ोसन से प्रतिदिन फ़िजूल की बातें सुन-सुन कर सरला के कान पक चुके थे। व्यक्तिगत रिश्तों में भी बिना सुभाव दिये वे़ रह नहीं रह सकती? निलय से उन्हें क्या लेना-देना? मेरे-उनके बीच किसी तरह का कोई संबंध भी नहीं तो फिर उसके पति की शिकायत के पीछे की योजना क्या है? माथे पर बल दिये ख़ुद से ही सरला सवाल किया करती और ख़ुद ही उसका हल ढूँढा करती। किसी के पारिवारिक जीवन में, आपसी कलह-पीड़ा के बीच किसी तीसरे का उस पर अपना विचार थोपना क्या असंवैधानिक नहीं? कहीं न कहीं कोई बात अवश्य है, वरना किसी को क्या पड़ी है कि वह दाल-भात में मूसलचन्द बनने की ज़ुर्रत करे । रोज़-रोज़ एक ही बात के दुहराव से किसी भी मनुष्य की मनःस्थिति में बदलाव का वातावरण तैयार हो ही जाता है। सरला न तो किसी आर्थिक परेशानी के बोझ तले दबी थी और न ही वह शारीरिक अथवा मानसिक शोषण का शिकार थी जिसकी वज़ह से उसके समक्ष एकांत जीवन जीने की समस्या आन पड़ी हो? हाँ....! यह अवश्य था कि एक परिवार के वैचारिक व सामाजिक सरोकार में मुखिया की भूमिका से शनैः शनैः दूर होता जा रहा था निलय। पति-पत्नी के दाम्प्त्य जीवन में रिश्तों का जो अटूट बंधन होना चाहिए था, पिछले कुछ वर्षों से उसमें देखी जा रही थी न समझ पाने वाली भारी गिरावट।

श्रेष्ठता के मानसिक द्वन्द्व में बौद्धिक रूप से ख़ुद को परिपूर्ण समझने वाली महिलायें दूसरों को हमेशा पराजित करने की कर बैठती हैं धृष्टता। जिनका दाम्प्त्य जीवन ख़ुद ही उथल-पुथल भरा हो, वैसी महिलाएँ नहीं चाहतीं कि उनकी आँखों के सामने श्रेष्ठ जीवन जीने की योग्यता कोई और साबित करे। पड़ोसी मिताली गायकवाड़ की बातें सुन-सुन कर सरला ख़ुद को काफ़ी तन्हा महसूस करने लगी थी। पति से दूर रहने व स्वतंत्र जीवन जीने के टिप्स श्रवण सुख तो अवश्य दे रहे थे, किन्तु ग्रेजुएट सरला पति-पत्नी के बीच मधुर रिश्तों में खटास पैदा करने की मिताली गायकवाड़ की मंशा से भी अनभिज्ञ नहीं थी। नाउम्मीदी वाली लगातार कोशिशों के बावजूद भी मिताली गायकवाड़ की बातों से सरला प्रभावित नहीं हुई, तो अंततः उन्होंने अपना संबंध विच्छेद कर लिया। मिताली गायकवाड़ से सरला भी चाहती थी छुटकारा पाना। दोनों के बीच गाढ़ी दोस्ती शीतयुद्ध में तब्दील हो चुकी थी।

मर्दों के विरुद्ध लगातार प्राप्त हो रही शिकायतों के बाद भी आँखें बन्द रखने वाली महिलाओं के दिल के किसी कोने में शंकाएँ आख़िर घर कर ही जाती हैं। किसी की दूसरे से क्या दुश्मनी हो सकती है? गायकवाड़ जी की पत्नी को उससे लेना ही क्या है? न तो वह उसकी कोई रिश्तेदार है और न ही प्रतियोगी। लगभग तमाम मामलों में वे सरला से बीस ही थीं। उनकी शिकायतों के पीछे कोई बड़ी वज़ह तो होगी ही? गायकवाड़ जी की पत्नी से निलय के विरुद्ध लगातार मिल रही शिकायतों पर सरला गंभीर हो गई। क्यों निलय उससे दूर रहना चाहता है? न तो पत्नी के प्रति कोई वफ़ादारी और न ही बच्चों के प्रति ही विशेष जवाबदेही? काम के लिये घर से अलसुबह निकलना और देर रात को लौटना सरला की शंका को और भी बल प्रदान कर रहा था। निलय कहीं किसी दूसरी औरत के संपर्क में तो नहीं.......? कौन है वह चुड़ैल जिसने उसके दाम्प्त्य जीवन ज़हर घोल रखा है?

(4)

निलय न तो एक पति की ही भूमिका निभा पा रहा और न ही एक पिता की। इतना वह अवश्य जानती थी कि समय पर दफ़तर जाना व समय पर वापस लौटना ही निलय की एक मात्र दिनचर्या है। काफ़ी दिनों के बाद मिताली गायकवाड़ अचानक एक दिन सरला के दरवाज़े पर खड़ी दिखी। सरला चौंक गई। अंदर ही अंदर उसे ग़ुस्सा भी आया। अब क्या लेने आई हैं? मन ही मन वह भुनभुनाती भी जा रही थी। टोक-टाक किये बिना पूर्व की भांति वह अपने कार्यों में लगी हुई थी। सरला के ग़ुस्से से मिताली गायकवाड भली-भाँति परिचित थीं। ऊपर से ही सही, मुस्कुराते हुए उन्होंने सरला का हाल-चाल पूछा। बच्चों की पढ़ाई का ब्यौरा लिया। कई अन्य जानकारियों से रूबरू हुईं। अभी-अभी कॉलोनी मे एक नये इंजीनियर साहब पधारे हैं। बड़े नेक दिल इंसान हैं। सीधे-सरल लोगों के रहने से कॉलोनियों में एक सभ्यता देखने को मिलती है। पता नहीं कहाँ से आए हैं किन्तु कॉलोनी में उनके आने से बच्चों में ख़ासा उत्साह देखा जा रहा है। मिताली गायकवाड़ लगातार बोले जा रही थीं। किसी के आने-न आने से उसका क्या लेना-देना? प्रतिदिन लोग एक जगह से दूसरे जगह जाते-आते रहते हैं। आज यहाँ तो कल वहाँ। इसमें नयी कौन सी बात है? इशारे में ही सही, उसने मिताली गायकवाड़ को हाँ में जबाव दिया। कैसी हैं आप? इन दिनों और क्या चल रहा है? बच्चे कैसे हैं? मिताली गायकवाड़ से सीधा प्रश्न किया सरला ने। ठीक हूँ, बच्चे भी अच्छे हैं। काफ़ी दिन बीत गए थे, सोचा तुम से भेंट करती चलूँ। पति व बच्चों के बीच दिन भर पिसी रहती हूँ, फ़ुर्सत ही कहाँ मिल पाती है। काफ़ी देर दोनों के बीच घर-गृहस्थी, अपने-पराये की बातें होती रही। विचारों का आदान-प्रदान हुआ, कुछ समय गुज़ारने के बाद मिताली गायकवाड़ वापस लौट चलीं अपने घर की ओर।

अभी-अभी एक नये इंजीनियर साहब कें पहुँचने की ख़बर इधर काफ़ी वायरल हो चुकी थी, जिसकी जानकारी मिताली गायकवाड़ से सरला को पूर्व में ही मिल चुकी थी। स्वभाव, चाल-चलन से कोई अच्छे ख़ानदान का ही मालूम पड़ता था वह। कुशाग्र बुद्धि नये इंजीनियर साहब की दिनचर्या व उनके क्रिया-कलाप सर्वोदय कॉलोनी निवासियों के मंथन का एक नया विषय बन चुका था। मज़बूत क़द-काठी, छरहरा बदन व स्वभाव से हँसमुख कुछ ही दिनों में उन्होंने कॉलोनीवासियों के बीच अपनी मज़बूत पकड़ बना ली थी, यह दिगर बात थी कि अधिक दिन नहीं बीते थे उनके नौकरी में क़दम रखे हुए। यह भी ज्ञात हुआ, अभी तक अविवाहित ही हैं। परिवार वालों के बीच अक्सर किसी अनब्याहे मर्द को रहने की तवज्जो नहीं दी जाती, किन्तु नये इंजीनियर साहब के साथ ऐसी कोई बात नहीं थी। बच्चों से उनका ख़ास लगाव का ही परिणाम था कि तमाम परिवारों के बीच एक अलग पहचान वाले किरदार वे बन चुके थे। कॉलोनी के अन्य बच्चों की तरह ही सरला के दोनों बच्चे भी नये अंकल के काफ़ी क़रीब पहुँच चुके थे। पापा रहें या न रहें, बच्चों को पड़ोंस के अंकल का भरपूर प्यार प्राप्त था। पढ़ने-लिखने से लेकर खेलकूद व अन्य जानकारियाँ बच्चे अंकल से प्रतिदिन प्राप्त किया करते। बच्चे ख़ुश तो उनके माता-पिता भी रहते हैं प्रसन्न। पड़ोस के अंकल सरला के बच्चों से काफ़ी प्रभावित थे। अन्य बच्चों से अलग हटकर थे सरला के बच्चे।

कॉलोनी में नये इंजीनियर के आगमन व बच्चों से उनकी दोस्ती की अद्यतन जानकारी से सरला ने अवगत कराया निलय को। निलय था कि इन सब बातों से उसे कोई लेना-देना ही नहीं था। कौन आता है और कौन जाता है, इस जानकारी की कोई दरकार भी नहीं थी। सरकारी नौकरी में नये लोगों का आना, ट्रान्सफर-पोस्टिंग का खेल यूँ ही चलता रहता है। कितने लोगों पर वह ध्यान दे। दुनिया-जहाँ से अलग-थलग व्यक्ति के लिये कोई नई-पुरानी बात नहीं होती। सरला की बातों का कोई असर निलय पर नहीं दिखा। अंदर ही अंदर जल-भुन गयी वह। वाह रे इंसान? जिसके लिये पूरी उम्र बलिदान कर चुकी हो, वही ग़ैर निकला? अपनी पत्नी के साथ इस तरह का व्यवहार, यह ग़ैर ज़िम्मेदाराना नहीं तो और क्या है? सरला काफ़ी दुःखी थी।

(5)

पति के जीवन में झाँकने, एक पत्नी के रूप में सही सलाह देने व अन्य दायित्वों के प्रति उसे ख़बरदार करने के सारे अधिकारों से वंचित पा रही थी ख़ुद को वह। अब और कितने दिन....? एक पत्नी के अधिकार का इस्तेमाल किया हो, किसी ने देखा क्या? ख़ुद की समझदारी व वफ़ादारी का प्रयोग न करती तो अब तक महाभारत में तब्दील हो चुका होता उसका घर। बच्चों का पल्लवित जीवन दुश्वारियों से भर गया होता। माँ की चिन्ता से बच्चे काफ़ी हद तक अवगत थे। अब पानी सर से ऊपर उठ चुका था। पति-पत्नी के बीच रिश्तों की बुनियाद ने एक बड़े जंग का रूप लेना शुरू कर दिया। पत्नी व बच्चों से निलय की दूरियाँ इसी वज़ह से लगातार बढ़ती चली गई। बच्चों के सहारे ही गुज़ार लेगी वह अपना जीवन?

एक पति के रूप में निलय ने अब तक उसे दिया ही क्या है? पैसे की बदौलत ही दुनिया ख़रीदी-बेची जाती, पति-पत्नी के रिश्ते बनाए-बिगाड़े जाते, बच्चों का भविष्य बनाया जा सकता तो और बात थी? सात फेरे लेकर जीवन भर एक साथ रहने व पत्नी की सुरक्षा की क़समें ख़ुद-ब-ख़ुद दम तोड़ने पर आतुर दिखलाई पड़ रही थीं। निलय व सरला के बीच पति-पत्नी की मात्र औपचारिकताएँ ही रह गई थी शेष बाक़ी सबकुछ ज़मींदोज़ होता जा रहा था स्वतः ही। पड़ोस के अंकल की बड़ाई बच्चे खूब करते। बच्चों को कभी वे एलियन की कहानी सुनाते तो कभी अंतरिक्ष, चन्द्रमा पर फ़तह करने वाले वैज्ञानिकों की वीरता व साहस की गाथा से उन्हें वाक़िफ़ कराते। रामायण-महाभारत की ढेर सारी कहानियाँ उन्हें याद थी। बच्चों को बहलाने के प्रयास में कभी ख़ुद ही बच्चों की तरह हो जाते। सरला अपना भावी जीवन काफ़ी कष्टमय देख रही थी। एक औरत का संपूर्ण शृंगार उसका पति होता है। जब पति ही उससे मुँख मोड़ ले तो फिर पैसे किस काम के? पैसे कमाने की चाहत में इंसान इस क़दर मस्त हो जाता है कि उसे यह भी ज्ञात नहीं होता कि जिसे वह घर समझने की भूल कर रहा वास्तव में वह घर नरक में तब्दील हो जाता है। विवाहोपरांत सरला ने कई सुखद स्वप्न देखे थे। एक अच्छे पति की कल्पना का ऐसा हश्र होगा उसे पता ही नहीं था। दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही अपनी परेशानियों से किसे वह अवगत कराएगी? अंदर ही अंदर गम का घूँट पी कर सरला गुज़ार रही थी अपनी ज़िन्दगी। माता-पिता को कोसने के अलावा उसके पास और कुछ भी नहीं था शेष।

बच्चों के मुख से प्रतिदिन पड़ोस वाले अंकल की बड़ाई सुनते-सुनते सरला का बालपन चरम पर आ पहुँचा था। स्कूल से घर और फिर पड़ोस वाले अंकल के साथ मटरगश्ती, बच्चों के लिये दिनचर्या बन चुकी थी। बच्चों के काफ़ी अनुनय-विनय का ही परिणाम था कि पड़ोस वाले अंकल सरला के घर आने-जाने लगे थे। कुछ दिनों तक तो सरला उनकी मौजूदगी से झेंपती रही, किन्तु लगातार पड़ोस वाले अंकल के घर में दस्तक़ से जो दूरियाँ बनी हुई थी, शनैः शनैः घटती चली गईं। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही दिनों में दोनों एक-दूसरे के काफ़ी क़रीब आ गए। कहते हैं अपनों से ठोकर खाया हुआ आदमी जब टूट की कगार पर होता है, ऐसी परिस्थिति में ग़ैरों का सहारा उसे अपना सा प्रतीत होने लगता है। निलय से दूर जा चुकी सरला पड़ोस के नये इंजीनियर साहब के क़रीब आने से ख़ुद को काफ़ी तरो-ताज़ा महसूस कर रही थी। इधर पत्नी की तमाम गतिविधियों से अनभिज्ञ निलय अपनी ही धुन में चला जा रहा था।

कुछेक दिनों से सरला के व्यवहार में अचानक आए परिवर्तन से उसकी आँखें खुली। वह सावधान गया। उसे महसूस हो रहा था, दफ़तर से घर पहुँचने के बाद की ख़ातिरदारियों में कमी माजरा। पहले की तरह अब न तो सरला उसके क़रीब आती और न ही दिनभर की थकान के बाद पति के लिये एक पत्नी की ज़िम्मेवारियों को निभाती। यहाँ तक कि संवाद से भी उसने परहेज़ कर लिया था। चाय-पानी, खाना-नाश्ता की बात ही जुदा थी। एक नयी ज़िन्दगी, एक नये सफ़र का आगाह कैसा हो सकता है, सरला इसी ख़्वाब में खोयी रहती। उसने तय कर लिया था, बाक़ी की बची ज़िन्दगी वह अपने सिद्धान्तों पर बिताएगी। अब न तो उसे निलय की चिन्ता रहती और न ही बच्चियों की। बच्चियाँ अपनी देखभाल कर सकने में ख़ुद सक्षम हैं, मन ही मन यह सोच कर सरला बेफ़िक्र हुई जा रही थी।

(6)

पड़ोस के नये इंजीनियर साहब सरला के मोहजाल में इस क़दर फँस चुके थे कि सारी ख़ुशियाँ सरला में ही निहित दिखलाई पड़ रही थी उन्हें। माँ-बाप, घर-परिवार के दायित्वों से उन्हें कोई लेना-देना नहीं था। जिस माता-पिता ने काफ़ी मशक्कतों के बाद उन्हें इस लायक़ बनाया कि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें उन्हीं माता-पिता के सपनों को वे चूर-चूर कर देना चाहते थे। माँ-बाप के इकलौते वारिस जो ठहरे। संभव है उनके उठाए जाने वाले इस क़दम से कुछ दिनों रंजिश की स्थिति बने किन्तु आख़िर कब तक वे अपने पुत्र से दूर रहेंगे? बेटे के निर्णय को अंततः स्वीकार करना ही पड़ेगा उन्हें। रिंकी व पुष्पा को इस बात का अहसास हो चुका था कि उनकी मम्मी ग़लत रास्तों की ओर क़दम बढ़ा चुकी हैं। बच्चियाँ ख़बरदार हो चुकी थीं। माँ के बदलते व्यवहार का परिणाम वे जानतीं थीं। पहले पिता के प्यार-मुहब्बत से अलग-थलग थी, अब माँ से। पिता की आँखें तो खुल चुकी थीं। माँ उनसे दूर जा रही थीं। मर्द भटक जाए तो कोई नई बात नहीं किन्तु जिस औरत की दो-दो संतानें जवानी की दहलीज़ पर क़दम रख रही हों, और वह ख़ुद भटक जाए तो धरती पर इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है? एक लंबे अन्तराल के बाद घर-आंगन में ख़ुशियों ने दस्तक़ देना प्रारंभ किया था, इन ख़ुशियाँ का वापस लौट जाना भविष्य के लिये सुखद नहीं था। दूर से दिखने वाली तमाम चीज़ें सुन्दर व आकर्षक ही नहीं हुआ करतीं, आँखों का भ्रम इन्सान की ज़िन्दगी तबाह-बर्बाद कर सकता है। बच्चियाँ चाहती थीं दो अलग-अलग विचारधाराएँ फिर से एक शरीर, एक आत्मा में समा जाएँ। उनके माता-पिता का दाम्पत्य जीवन फिर से हरा-भरा दिखने लगे। बच्चे जब बड़े हो जाते हैं तो उनमें भी अच्छे-बुरे का ज्ञान हो जाता है। जीवन में वास्तविकाओं की समझ व सूझ-बूझ पैदा हो जाती है। भूत-भविष्य और वर्तमान मे फ़र्क का ज्ञान विकसित हो जाता है। सुबह का भूला यदि शाम को वापस लौट आए, तो उसे भूला नहीं कहते। अपनी उम्र से अधिक सोच व समझ रखने वाली बच्चियों के अनुनय-विनय से निलय की वापसी हो चुकी थी, किन्तु सरला अपने इरादे पर अब तक अटल थी। समय और ज्वार-भाटा किसी का इंतज़ार नहीं करता। जिस सरला के चाल-चलन व व्यवहार से कॉलोनीवासी गर्व महसूस किया करते, सरला की नियत में अचानक आए फ़र्क से वे भी कम विचलित नहीं थे। दूसरों को जीवन जीने के टिप्स सिखाने वाली सरला डूब चुकी थी घुप्प अँधेरे में। नये इंजीनियर साहब के अलावा और कुछ भी नहीं सूझ रहा था उसे। कॉलोनीवासियों की नज़र में सबसे बड़ी समस्या जवान हो रही उसकी दोनों बच्चियों को लेकर थी।

बच्चियाँ ग़लत रास्तों को अख़्तियार न कर लें? किसी से प्यार, मुहब्बत ग़लत बात नहीं, इसकी आड़ में घर-परिवार, बच्चे-बच्चियों का भविष्य अधर में लटक जाए यह कहाँ का न्याय है? कौन उसके पक्ष और कौन विपक्ष की बातें कर रहा, इन सब बातों से सरला को कोई सरोकार नहीं। एक दुःखद स्वप्न की तरह अपनी ही आँखों के सामने निलय देख रहा था उजड़ता हुआ अपना घर-परिवार। सगी माँ के प्यार से बिछड़ रही रिंकी व पुष्पा को। वह काफ़ी निराश हो चुका था। मानसिक तनाव असंतुलित होता जा रहा था वह। क्या करे, क्या न करे की उधेड़बुन में समय व्यतीत हुआ जा रहा था। होशियारपुर से अन्यत्र उसके आवेदन पर अब तक कोई निर्णय नहीं लिया जा सका था। अचानक महुआ चौक खड़हरा के लिये स्थानान्तरण का पत्र पाकर उसे ऐसा लगा मानो ज़िन्दगी के सारे जंग पलक झपकते ही उसने जीत लिये हों। उसे विश्वास था स्थान परिवर्तन से सरला के व्यवहार में भी परिवर्तन होगा और वह लौट आएगी अपने पुराने वजूद में। निलय ने निश्चय कर लिया था कि अब वह पैसे के पीछे भागेगा नहीं और न ही वह सरला से अलग-थलग ही रहेगा।

महुआ चौक, खड़हरा निलय के लिये बिल्कुल नया जगह था, यहाँ के लोग भी थे पूर्णतः अपरिचित। कुछ महीनों तक अपना आशियाना बसाने में ही वक़्त ख़र्च हो गया था। इसी दरम्यान कई अलग-अलग लोगों से उसकी निरंतर मुलाक़ात भी होती रही। हाय..हेलो... से कुछेक के साथ घनिष्टता भी बढ़ती गई। निलय फिर से अपने पुराने रुतबे में लौट चुका था। विभाग में काम का वही बोझ और वक़्त भी लगभग एक जैसा ही ख़र्च करना पड़ रहा था उसे। बेटियाँ पढ़ाई-लिखाई में व्यस्त रहने लगी, सरला में कोई फ़र्क किन्तु देखने को नहीं मिल रहा था।

(7)

वह पुराने ख़्यालों में अभी भी खोई रहती। महेश सोलंकी के नाम से पहचाने जाने वाले नये इंजीनियर साहब अब काफ़ी पुराने हो चुके थे। महेश के नाम से ही सरला के दिलो-दिमाग़ में वे छाए थे। महेश की यादों में उसने खाना-पीना भी कम कर दिया था। यही हाल लगभग इंजीनियर महेश सोलंकी का था। उन्हें इस बात की जानकारी हो चुकी थी कि निलय महुआ चौक, खड़हरा में अपना डेरा-डंडा जमा चुके हैं। होशियारपुर से महुआ चौक, खड़हरा में स्थानान्तरण के लिये उन्होंने भी विभाग में अर्जी डाल रखी थी। स्थानान्तरण के लिये अर्जी तो मात्र एक बहाना था, किसी भी सूरत में उन्हें सरला तक पहुँचना था। जाने वह किस हाल में होगी?

स्थानान्तरण की अर्जी तो उनकी रद्द हो गई तथापि वे महुआ चौक, खड़हरा की ओर प्रस्थान कर गए। लगातार कई-कई दिनों तक महुआ चौक, खड़हरा की ख़ाक़ छानने के बाद अंततः सरला उन्हें मिल ही गईं।

"मुझे तन्हा छोड़कर यूँ छुप जाना क्या तुम्हें अच्छा लगा? इतना भी नहीं सोचा तुम्हारी अनुपस्थिति में मेरा क्या होगा? मेरी ज़िन्दगी किस मोड़ पर आकर थम जाएगी? हमारे सपनों का क्या होगा? प्यार करने वाले किसी अंजाम की परवाह नहीं किया करते सरला? एक-दूसरे से मुहब्बत कर हमनें कोई गुड्डे-गुड़ियों का खेल नहीं खेला है? मुहब्बत के नाम पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले उन मृतात्माओं को क्या जबाव देगें, जिनके सपनों की अंगुली थामे आज हम इस मुक़ाम तक पहुँच पाने में सफल हो पाए हैं? क्यों नहीं कह देती निलय से कि हमारा संबंध मात्र कुछ ही क्षणों तक सीमित रहने वाला नहीं? एक-दूसरे के साथ जन्म-जन्म तक जीने-मरने की क़समें हमनें खायी हैं। एक-दूजे से हमें कोई अलग नहीं कर सकता!" महेश सोलंकी बाहुपाश में सरला को चिपकाए मन के अंदर की भड़ास क्षण भर में ही निकाल देना चाहते थे।

"हाँ महेश, तुमने ठीक ही कहा.....! एक-दूसरे से हमें कोई अलग नहीं कर सकता? भगवान भी यहाँ आ जाएँ तब भी हम अपने इरादे से हटेंगे नहीं। घुट-घुट कर जीना भी कोई जीना है? छुप-छुप कर जीने से अच्छा है मौत को गले लगा लेना। क्यों नहीं दुनिया-समाज के सामने अपना सच प्रकट करते हुए हम-दोनों विवाह बंधन में बँध जाएँ?"

दोनों ऐसे मिले मानो सदियों से वे दोनों एक-दूसरे से बिछड़े हुए हों।

"जो भी करना हो शीघ्र करो महेश? समय बहुत कम है और खतरा काफ़ी ज़्यादा। निलय को हमारी मुलाक़ात की जानकारी हुई तो फिर एक नयी मुसीबत आन पड़ेगी? वह जितना गंभीर व शांत है उतना ही ख़तरनाक भी। थोड़ी सी भी भनक लगी कि रास्ते से हमें हटाने की सारी हदें पार कर जाएगा? यदि ऐसा हुआ तो मेरा मरा चेहरा उसे देखना पड़ेगा," कहकर सरला अचानक फफक-फफक कर रो पड़ी।

"अरी पगली...! हम ऐसा नहीं होने देंगे। साथ-साथ जीने-मरने की क़समें खायी हैं, अंजाम जो भी होगा उसे भुगतने के लिये हम सहर्ष तैयार हैं।"

आपस में बातें करते-करते दोनों एक अलग ही संसार में खो गए। अब और इंतज़ार सहा नहीं जाता.....!

इधर महेश सोलंकी के होशियारपुर पहुँचने की ख़बर से निलय काफ़ी पशोपेश में पड़ चुका था। समस्या के समाधान की दिशा में कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था। करे भी तो क्या? सरला अब उसके हाथ से निकल चुकी थी। रिंकी व पुष्पा अन्दर से टूटती जा रही थीं, तथापि आँसुओं के घूँट पी रहे पिता को दिलासा दे रही थीं।

"पापा....पापा...अब क्या होगा, किसके सहारे हम अपनी तमाम उम्र जिएँगे? हम बहनों का क्या क़सूर जो माँ हमें छोड़ने पर विवश दिख रहीं..?"

रिंकी व पुष्पा की बातों से निलय का कलेजा फट चुका था। उसकी आत्मा के टुकड़े हो चुके थे। जीवन में सिर्फ़ व सिर्फ़ पैसे कमाने की चाहत ने उसकी ज़िन्दगी को ख़ामोशियों के गर्त मे धकेल दिया था। पैसे कमाने की लत उसे इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर देगी, जीवन में कल्पना तक नहीं की थी उसने। पैसे कमाना हर इंसान की फ़ितरत होती है, उसने इस ख़्वाहिश को पाला तो क्या ग़ुनाह किया? पूरी दुनिया पैसों के आगे ही तो घूमती-भागती है। जिस किसी के पास, जहाँ भी पैसे हैं दुनिया की सारी ख़ुशी उसे हासिल है। पैसों के विरुद्ध अपनी ज़िन्दगी में निलय ने किसी को घर त्यागते हुए देखा तो वह थी सरला। निलय माजरा समझ नहीं पा रहा था।

(8)

अविवाहित अवस्था में सरला की ज़िन्दगी के घटनाक्रमों को वह चाह रहा था खंगालना। कहीं ऐसा तो नहीं कि उससे विवाह पूर्व भी उसके किसी और के साथ रिश्ते रहे हों..........? वह चाहता तो पत्नी की बेवफ़ाई का माकूल दंड उसे दे सकता था, किन्तु उसने ऐसा कुछ भी नही किया। वह जानता था एक छोटी सी भी ग़लती उसके लिये कई बड़ी-बड़ी समस्याओं का कारण बन सकती है। अंततः सबकुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया। हे ईश्वर...! मेरी ग़लतियों का की सज़ा इन बच्चियों को भुगतनी न पड़े, इनकी रक्षा करना! महेश सोलंकी व सरला की नयी ज़िन्दगी का साक्षी बना महुआ चौक, खड़हड़ा। पुरानी यादें, पुराने संस्मरण, पुराने रिश्ते-नाते विस्मृत करते हुए सरला ने महेश के साथ जीवन का नया अध्याय शुरू किया था। अब महेश ही उसकी ज़िन्दगी का शाहजहां और वह उसकी मुमताज़ महल थी।

महुआ चौक, खड़हड़ा के इतिहास में शायद ही इस क़िस्म का कोई मामला सामने आया हो, जहाँ पति व बच्चों से भरा-पूरा परिवार छोड़ किसी महिला ने ग़ैरमर्द को अपना हमसफ़र बनाया हो। सरला व महेश सोलंकी के विवाह की ख़बर आग की तरह पूरे शहर में फैल गई। जिसकी जैसी जुबां, उसकी वैसी ही बातें। कोई निलय को दोषी ठहराता तो कोई सरला को। अधिकांश लोग दो-दो बच्चियों की परवरिश पर हैरान-परेशान दिख रहे थे। औरतें घर की इज़्ज़त होती हैं, शिष्टाचार, सहनशीलता व आचारसंहिता उनका परिधान होता है। कुछ महीनों तक निलय व बच्चियों की ग़ुम हो चुकी नींदें शनैः शनैः पटरी पर वापस लौट आयीं।

दो-दो बच्चियों की पढ़ाई-लिखाई से लेकर उनके विवाह तक की चिन्ता से निलय परेशान दिख रहा था। समय गुज़रता गया। निलय की दोनों बच्चियों ने ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी कर ली थी। वे विवाह के योग्य भी हो चुकी थीं किन्तु उन्होंने विवाह करने से साफ़ इंकार कर दिया था। पति-पत्नी के रिश्तों में रखा ही क्या है? क्यों वे करें विवाह? अपनी आँखों के सामने ही उन्होंने देख लिया था पति-पत्नी के रिश्तों का हश्र। कोई किसी पर कैसे विश्वास करे। शादी के कई वर्षों बाद भी बाल-बच्चेदार लोग जब पति-पत्नी के रिश्तों के वास्तविक सच से अनभिज्ञ हो जाते हों, तो फिर उनकी शादी का क्या भरोसा? बच्चियों की ज़िद के आगे निलय ने घुटने टेक दिये। वे जो चाहती हैं उन्हें करने देने में ही भलाई है। उनकी इच्छा का दमन करना नहीं चाहता था वह। वह जानता था उसकी दोनों बेटियाँ सौम्य, सुशिक्षित व सुसंस्कृत हैं। ऐसा कोई काम वे नहीं करेगीं जिससे समाज में उसका सर झुक जाए। बच्चियों की ओर से वह निश्चिंत हो चुका था।

कुछ वर्षों तक महेश सोलंकी व सरला के दिन ऐसे बीते मानो उनके अलावा दुनिया में किसी और के लिये कुछ बचा ही न हो। पता ही नहीं चला ज़िन्दगी में ख़ुशियाँ पाने के लिये और भी बहुत सारी चीज़ों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। जिन ख़ुशियों की ख़ातिर सरला ने निलय से ख़ुद को अलग कर रखा था, महेश सोलंकी दिल खोलकर उसकी भरपाई कर रहे थे। बड़े इत्मिनान से जीवन की बैलगाड़ी आगे बढ़ रही थी। कोई गिला-शिक़वा नहीं था। महेश सोलंकी व सरला के कंजुगल लाईफ़ की सभी दाद देते, पति-पत्नी के रिश्ते हों तो इस तरह। एक कम उम्र युवक के साथ तिलस्मी प्रेम व वासना का मिज़ाज परवान पर था। महुआ चौक, खड़हड़ा से होशियारपुर तक यह बात आग की तरह फैल चुकी थी। महेश सोलंकी के माता-पिता व परिवार के अन्य सदस्य भी बेटे के इस निर्णय से बेहद संतुष्ट दिख रहे थे। अंकुरित पौधों के विकास के लिये एक बड़ा वक़्त सामने पड़ा होता है। माता-पिता व अभिभावकों की बुढ़ापे में क्या भूमिका? बच्चों के निर्णय पर मोहर लगाना ही इच्छा से अधिक उनकी मजबूरी हो जाती है। वे नाख़ुश रहें तब भी, बच्चे जो चाहेगें वहीं करेगें। समय और ज्वार-भाटा किसी का इंतज़ार नहीं करता। बदलते वक़्त की मानसिकता का कोई ठौर नहीं। कुछ महीनों से महेश सोलंकी इधर काफ़ी उदास चल रहे थे। उन्हें बच्चे चाहिए थे, और सरला बच्चे जनने में असमर्थ थी। कई चेकअप के बाद भी डाक्टरों ने उन्हें निराश ही किया।

(9)

ख़ामोश घर में बैचेन थी दो आत्माएँ। घर-परिवार से लेकर आस-पड़ोस के लोगों का ताना ज़ारी था। किस-किस को समझाए कि बच्चे जनने के क़ाबिल वह नहीं रही। महेश सोलंकी हतप्रभ थे। माँ-बाबूजी को कैसे समझाया जाय, पोते-पोतियों के लिये उनकी आँखें बिछी थीं। अब न तब, बच्चे उनकी गोद में विश्राम लेंगे ही। डॉक्टरों की सलाह पर जो भी संभव था, संज्ञान में लिया गया। कोलकाता से चैन्नई तक की सड़कें एक कर दी गईं। मंदिर-मस्जिद, गिरजा-गुरुद्वारों तक को नहीं छोड़ा गया, लेकिन व्यर्थ। कहीं से भी उम्मीद की कोई किरण नज़र नहीं आ रही थी। निराश-हताश महेश सोलंकी के लिये अपन क़िस्मत पर आँसू बहाने के अलावा और कुछ भी नहीं बचा था शेष।

इधर यूटरस में इंफेक्शन की वज़ह से सरला दिन-व-दिन कमज़ोर होती जा रही थी। कमज़ोरियों की वज़ह से उसने धीरे-धीरे खाना-पीना भी छोड़ दिया था। दवा और दुआ के भरोसे चल रही थी उसकी ज़िन्दगी। इधर महेश सोलंकी की ज़िन्दगी में विरानियों का सैलाब उमड़ चुका था। माँ-बाबूजी को अब तक उन्होंने दिया ही क्या? सारी ज़िन्दगी वही किया जो उन्हें अच्छा लगा। बचपन से आज तक बाबूजी के विरुद्ध ही तो वे चलते रहे। और अब, जब माँ-बाबूजी के लिये पोते-पोतियों से खेलने का समय आया तब भी......! इंजीनियर महेश सोलंकी अचानक फूट-फूट कर रो पड़े। एकपक्षीय निर्णयों से चल रही ज़िन्दगी का आशय उनकी समझ में आ चुका था। बड़े-बुजुर्गों का अनादर करके सुखी जीवन व्यतीत नहीं किया जा सकता, पर प्रेम करना कोई पाप है क्या? उन्मुक्त जीवन हर किसी की ख़्वाहिशें होती हैं, फिर मुझे ही यह सज़ा क्यों? ईश्वर ने बच्चों से मुझे ही वंचित क्यों रखा? मेरा गुनाह सिर्फ़ इतना ही है न कि मैंने एक विवाहित महिला से प्रेम किया? उससे शादी की? उसे अपना जीवनसाथी बनाया तथा उसी के साथ जीने-मरने की क़समें खायी? ख़ुद से ही सवाल करता और ख़ुद ही उसका उत्तर भी ढ़ूँढता।

किसी दूसरे के घर को आग के हवाले कर मनुष्य कब तक ख़ुद चैन की नींद सो सकता है कोई? दूसरों की अमानत को अपना बना लेना कहाँ तक जायज़ है महेश? तुम्हारी नज़र में भले ही यह पाक-साफ़ हो, किन्तु उस इंसान पर क्या बीत रही होगी जिसकी पत्नी तुम्हारे आगोश में सुख की नींद फ़रमा रही? इन आरोपों से क्या तुम बच पाओगे? महेश सोलंकी की आत्मा धिक्कार रही थी उन्हें। इधर बिस्तर पर दर्द से कराह रही सरला पिछले जीवन की घटनाक्रम मात्र के स्मरण से व्याकुल हुई जा रही थी। जीवन में उसने जो निर्णय लिये थे, उसका परिणाम इन दिनों उसे भुगतना पड़ रहा था। यह कोई छोटी-मोटी ग़लती नहीं थी, जिसका दूरगामी प्रभाव न हो। इस ग़लती से उसकी दुनिया तो उजड़ ही चुकी थी, उसने निलय को भी खोखला बना कर रख दिया था। ईश्वर की लीला भी अजीब है-कहीं धूप तो कहीं छाया, कहीं ख़ुशी तो कहीं ग़म। पर अति महात्वाकांक्षी व्यक्तियों के लिये दण्ड का प्रावधान भी ऊपर वाले ने ही तय कर रखा है। यूटेरस की बीमारी से सरला दिन-व-दिन कमज़ोर होती जा रही थी। खाना-पीना तो दूर की बात, उसने बोलना भी बंद कर दिया था। उसे यह ज्ञात हो चुका था कि अब और अधिक दिनों की मेहमान वह नहीं रहेगी। जीवन में जो पाप किये शायद उसका यही दण्ड हो।

प्रेमांध में सबकुछ समीप रहते हुए भी आदमी उससे कोसों दूर रहता है। महेश सोलंकी के स्वप्निल लोक में विचरण करने वाली सरला औंधे मुँह पड़ी थी। महेश सोलंकी के अलावा उसे देखने वाला कोई और मौजूद नहीं था। ऑफिस में लम्बी छुट्टी का दरख़्वास्त देकर पत्नी की सेवा में महेश सोलंकी अनवरत लगे रहे। पैसा तो पानी की तरह बह ही रहा था, शरीर में काम करने की शक्ति भी क्षीण होती जा रही थी। अकेला चना भाड़ नहीं फोडता़। कई-कई दिनों तक बिना झपकी लिये पत्नी की देख रेख करते-करते महेश सोलंकी भी काफ़ी थक चुके थे। कुछ दिनों तक आराम नहीं मिला तो वे भी गिर पड़ेगें, फिर क्या होगा? मुझे छोड़ कर नहीं जा सकती सरला? भगवान इतने निष्ठुर भी नहीं हैं कि वे हमारी भावनाओं को अनदेखा कर दें? अंदर ही अंदर महेश सोलंकी रोए जा रहे थे। सरला थी कि उनकी बातों का कोई असर उसे नहीं हो रहा था।

(10)

इशारे में उसने अपनी बेटियों से मिलने की इच्छा प्रकट की। कई वर्ष पूर्व बेटियों व पति निलय से सम्बन्ध विच्छेद कर चुकी सरला दरख़्वास्त कर रही थी सबसे इकट्ठे क्षमा याचना की। मौत से पहले देख लेना चाहती थी जवान हो चुकी अपनी बेटियों- रिंकी व पुष्पा को। चूम लेना चाहती थी उन्हें। वह चाहती थी बेटियों की मौजूदगी में ही चैन की नींद सोना। जीवन में गिले-शिक़वों के स्थायी समाधान का यह माकूल समय था। सरला की इस इच्छा से महेश सोलंकी स्तब्ध थे। जिन बेटियों से उनकी माँ को दूर रखा, जिस पति से उसकी पत्नी छीन ली जाय क्या संभव है उन्हें आमंत्रित करना? क्या वे मेरा मुँह भी देखना पसंद करेगें? ख़ुद के सामने मुझे देखकर उनका हृदय कठोर नहीं हो जाएगा? पुराने ज़ख़्म को कुरेदने का हश्र उन्हें भुगतना नहीं पड़ेगा? जिन बच्चियों के साथ अधिकांश समय उन्होंने उनकी ख़ुशी के लिये बिताए थे, उन बच्चियों की नज़र से वे गिर नहीं जाएँगे? मेरे विरुद्ध उनके मन की घृणा का बोझ क्या मैं सहन कर पाऊँगा? महेश सोलंकी अपने ही अनगिनत सवालों से घिरते जा रहे थे। जो भी हो, जीवन के अंतिम क्षणों में पत्नी की इच्छा से खिलवाड़ नहीं कर सकते। सरला के लिये संकटों का पहाड़ भी उठाने से वे हिचकेगें नहीं।

"अब क्या लेने आए हो? हिम्मत कैसे हुई मेरे दरवाज़े पर क़दम रखने की? सबकुछ लूट लेने के बाद भी चैन नहीं मिला? चाहता तो दोनों की इहलीला उसी वक़्त समाप्त करवा देता जब तुम दोनों एक-दूसरे से आलिंगनबद्ध थे। न रहता बाँस और न बजती बाँसुरी। किन्तु मैंने ऐसा नहीं किया। सब कुछ ऊपर वाले के ऊपर छोड़ दिया। किसी के घर उजड़ने से तुम्हें क्या मिला महेश सोलंकी? वासना के वशीभूत हो एक नासमझ महिला से तूने केवल जिस्म का रिश्ता बनाया था? मौत के मुँह में जाने से पहले हर किसी को अपने किये का पश्चाताप होता है, वह भी वही कर रही जो परिपाटी सदियों से चली आ रही है," आँखों में अंगारे लिये निलय टूट पड़ा था शब्दों की तलवार लिये महेश सोलंकी पर। आँखें नीचे किये व याचक भाव से खड़े महेश सोलंकी अपनी ही की गई ग़लतियों से जार-जार हो रहे थे। ठीक ही कहा, किसी की दुनिया-जहां उजाड़ने से पहले इतना अवश्य विचार कर लेना चाहिए कि आने वाले समय में उसका परिणाम कितना फलदायक है, किन्तु इन सब बातों के सोचने का वक़्त अब कहाँ? अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत। समय गँवाए बिना सरला की तमाम इच्छाओं से निलय को उन्होंने अवगत करा दिया।

"बिना मर्द की इज़ाज़त के घर की दहलीज़ से जो औरत बाहर क़दम रख ले, उसका अंतिम संस्कार कर देना ही श्रेयस्कर होता है? मैंने भी ऐसा ही किया है महेश सोलंकी! सरला उसी वक़्त मेरे लिये मर चुकी थी जब उसने अपने इरादे बदले थे।"

"किन्तु.........!!!"

"किन्तु क्या.....?"

"मौत की दहलीज़ पर खड़ी सरला बार-बार रिंकी व पुष्पा का ही नाम ले रही है। वह चाहती है जल्द से जल्द बच्चियों से उसकी मुलाकात हो," महेश सोलंकी की जुबां लड़खड़ा रही थी। आँसुओं को छिपाने की लाख कोशिशों के बावजूद वे ढरक रहे थे। जीवन के अंतिम पड़ाव में सरला की उपरोक्त इच्छाओं से निलय व उनकी दोनों बेटियों की बैचेनियाँ बढ़ने लगीं। अन्दर ही अन्दर मिलने की इच्छा जहाँ एक ओर बलवती होती जा रही थी वहीं दूसरी ओर पुरुष प्रधान समाज का अहम निलय को सरला से मिलने से रोक रहा था।

"क्षण भर भी देर किये बिना पापा हमें वहाँ चलना होगा। उनकी अंतिम इच्छा पूरी करनी होगी।"

माँ की ममता होती ही ऐसी है। मनुष्य कहीं भी क्यों न हो, अचानक में घटी घटनाओं का एहसास उसे हो ही जाता है। बच्चियों के आगे निलय नतमस्तक था। वह जानता था, अपनी ज़िद पर अड़ा रहा तो बची हुई ख़ुशियाँ भी उसके हिस्से से बेदख़ल हो जाएगी। आनन-फानन में सभी चल पड़े सरला के क़रीब। अचेतावस्था में पड़ी सरला निहार रही थी एकटक शून्य को। शरीर शिथिल पड़ चुका था। समय का चक्र देखिये, सुडौल शरीर, सुन्दर चेहरा व पूरी काया में गंभीरता का पर्दा ओढ़े जो सरला पहचान की मुहताज़ नहीं हुआ करती थी, कोसों दूर जा चुकी थी आज वह अपनी पहचान से। रिंकी, पुष्पा व निलय को सामने देख उसकी आँखें भर आईं। सैकड़ों बीमारियों के एक साथ आक्रमण घायल, झुर्रियों सी काया लिये उसकी आँखों से आँसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।

(11)

पूरी कठिनाई के साथ सुन पाने वाली आवाज़ में वह कहे जा रही थी- "बहुत कष्ट दिया न तुम सब को....! एक माँ की ममता से तुम बच्चियों को बेदख़ल करने की गुस्ताख़ी की। अपनी ज़िद्द के हवनकुण्ड में झोंक दिया तुम्हारे अरमानों को। एक पति के सपने को। घर-परिवार की आकांक्षाओं को, लेकिन करती भी क्या? मैं विवश थी। अपने अहंकार, क्रोध पर काबू न पा सकी।" दो-दो पतियों की एक साथ उपस्थिति से सरला महसूस कर रही थी अपने जीवन में एक बड़ी शांति। बच्चियाँ माँ की हालत पर काफ़ी दुखी व हैरान-परेशान थीं। वे चाह रही थीं जल्द से जल्द वे स्वस्थ हो जाए ताकि पुराने दिनों की तरह उनकी आँचल में छिप कर वे लुकाछिपी खेल सकें, किन्तु अब कोई फ़ायदा होने वाला नहीं था। डाक्टरों ने उसकी मौत का फ़रमान ज़ारी कर रखा था। दोनों पतियों (निलय व महेश) की हाथ थामे सरला सौंप रही थी उन्हें अपनी बच्चियों के भावी जीवन की महत्वपूर्ण ज़िम्मेवारी। बच्चियों ख़ुद को अनाथ न समझें, दो-दो पिता का प्यार उन्हें मिले। बच्चियों की परवरिश का सारा दारोमदार अब सिर्फ़ निलय के हिस्से नहीं था, महेश बराबर के साझीदार बन चुके थे। कुछ देर तक वातावरण शांत व ख़ामोश रहा। अचानक हल्की चीत्कार सुनाई पड़ी, निलय....महेश.... और सरला लुढ़क गईं। आनन्द व अवसान के बीच लुका-छिपी के खेल में शामिल रही सरला छोड़ कर जा चुकी थी अपना सब कुछ।

पहाड़ सी पीड़ा लिये स्तब्ध थे निलय व महेश। आपसी घृणा, विद्वेष व तिरस्कार की सारी सीमाओं को त्याग कर एक-दूसरे से लिपट कर दोनों ऐसे रो पड़े, प्रतीत होता था मानो दो अलग-अलग विचारधाराओं, मान्यताओं व परंपराओं की वाहक प्रतीक्षारत आत्माओं को उनकी मंज़िल प्राप्त हो गई हो। किसी को किसी से कोई गिला-शिक़वा नहीं था। रिंकी व पुष्पा ख़ुद को ठगी-ठगी सी महसूस कर रही थीं। जब प्रेम और ममता की छाँव में विश्राम करने का अवसर उन्हें प्राप्त हुआ और उनकी बाहें उन्हें प्राप्त करने को आतुर हुईं कि तभी कल्पनाओं का पटाक्षेप हो गया। पीछे छूट चुकी थीं हँसी-ख़ुशी जीवन जीने की सारी संभावनाएँ, सारे लक्ष्य। जीवितावस्था में न सही, जीवन के अंतिम क्षणों में ही, माँ के कहे दो शब्द उनके भविष्य के लिये कभी न मिटने वाले शब्द बन कर रह गए। दो दिशाओं, दो ध्रुवों, दो किनारों, दो बेसहारों को एक परिधि में लाकर खड़ा करने तथा दोनों के भविष्य के निर्णयों की पथगामिनी बन चुकी थी सरला। पारिवारिक जीवन में उतार-चढ़ाव के बीच समय-असमय जीवन में उसने जो निर्णय लिये थे, पश्चाताप की असह्य पीड़ा के बीच वह महसूस कर रही थी उन निर्णयों के आलोक में प्राप्त हो रहे परिणामों को। वह चाह रही थी, मरने के बाद भी उसकी की गई ग़लतियों के विरुद्ध आत्मा को छलनी करने वाली टिप्पणियों से वह मरहूम रहे, आज़ाद रहे।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें