अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
02.27.2014


मुझे नहीं मालूम

वो कौन था या रब,
मुझे नहीं मालूम।
फरिश्तों का भी होता है मजहब,
मुझे नहीं मालूम।।

मैं तो कब से बेताब हूँ इक अदद मुलाक़ात को,
कभी तुझको भी सताएगी ऐसी ही तलब
मुझे नहीं मालूम।।

वो चिनाब का पानी वो दिलकश शिकारा आज भी है।
मगर उस बेवा का बेटा आएगा कब,
मुझे नहीं मालूम।।

वो तो बच्चों की मुस्कान लहलहाती फसलों में रहता है,
उसे मंदिरों मस्जिदों में खोजने का मतलब,
मुझे नहीं मालूम।।

अक्सर पड़ोसियों का अपने हालचाल पूछ लेता हूँ,
शहरों में रहने के अंग्रेज़ी अदब,
मुझे नहीं मालूम।।

भरे हों पेट बच्चों के और जेब भी न खाली हो,
आएगी कभी ऐसी सुकून भरी शब,
मुझे नहीं मालूम।।

तमाशबीन सारी दुनिया और डोर उसके हाथ में,
दिखाने हैं अभी कितने और करतब,
मुझे नहीं मालूम।।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें