मेरी चाहतें अमितोष मिश्रा
ता-उम्र तेरी चाहतों का सीने में एक सैलाब रहे। खुदा ऐसी शब् न दे, जिसमें न तेरा ख़्वाब रहे।। तेरी आँखे है या समंदर मय का। मेरे घर में एक भी ना, बोतल-ऐ-शराब रहे।। एक सुहाने सफ़र सी होगी ज़िंदगी। आसपास मेरे ग़र, तुझ जैसा अहबाब रहे।। उठते हैं हाथ मेरे हर वक़्त इस दुआ में। क़यामत तक तू रहे, तेरा श़बाब रहे।। चाँदनी रात में वो छत पर टहलना तेरा। ख़ुदा ख़ैर करे, जब दो-दो आफ़ताब रहे।।