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ISSN 2292-9754

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03.20.2016


पार्टनर

आवाज़ में वही मधुरता जैसे कुछ हुआ ही नहीं, काम है करना तो पड़ेगा कोई लिहाज़ नहीं है। दुखी हो तो हो जाओ किसे पड़ी है बिज़नस देना है तो प्यार से बोलना पड़ेगा। छवि अब भी फ़ोन पर बात करती तो उसी मिठास के साथ कि मानो कुछ हुआ ही नहीं। वैसे कुछ हुआ भी नहीं। बस एक धुँधली तस्वीर को डेस्क से ड्रॉअर के नीचे वाले खण्ड में रखा ही तो है। अब उसकी ऑफ़िस-डेस्क पर केवल एक कम्प्यूटर, एक पेन-होल्डर और उसके पसंदीदा गुलाबी कप में अलग-अलग रंग के हाइलाइटर्स रखे थे। दो सप्ताह पहले तक, उसकी डेस्क की शान थी ब्रांच मैनेजर मिस्टर मिश्रा से बेस्ट एम्प्लोयी की ट्रॉफ़ी लेते हुए फ़ोटो। कैसे बड़े भाई की तरह उसके सर पर हाथ रख उसे आगे बढ़ने को प्रेरित कर रहे थे। आज उसने फ़ोटो को नीचे ड्रॉअर में रख दिया। अब वह ड्रॉअर के नीचे खण्ड को बंद ही रखती। वो फ़ोटो उसके लिए बहुत मायने रखती थी, इस कंपनी में पिछले छ: महीने से छवि सभी एम्प्लोयी के लिए एक रोल मॉडल थी और मिश्रा सर के लिए एक मिसाल।

छवि ने घड़ी को देखा-पाँच बजने में अब भी पच्चीस मिनिट बाक़ी थे, अगर उसके पास कोई अदृश्य ताक़त होती तो समय की इस बाधा को हाथ से पकड़ कर पूरा कर देती। समय चूँकि अपनी गति से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था, छवि ने अपने चेहरे पर हाथ रख आँखों को ढक अपनी विवशता को कुछ कम किया। अभी तो उसे लॉगआउट करने से पहले रीजनल मैनेजर विनोद को दिन भर की रेपोर्टिंग करनी थी, यही सोच कर उसका रोने का मन कर रहा था। अगर उसने फ़ोन नहीं किया तो कभी भी उनका फ़ोन आ सकता है, ऑफ़िस का काम ऑफ़िस में ही ख़त्म हो जाए तो अच्छा है। घर तक ले जाने की ना तो उसकी ताक़त थी और ना ही मंशा। यह आख़री काम ख़तम कर छवि एक पंख के कबूतर की तरह अपने कंपनी के वन बेडरूम फ़्लैट में आ गयी।

फ़्लैट की ऑफ़-व्हाइट दीवालों ने उसका स्वागत उसी तरह किया जैसे उसने किसी अनजान पड़ोसी को गुड मॉर्निंग ग्रीट किया हो। कंपनी ने बेसिक फ़र्निचर प्रोवाइड करवा रखा था, ब्रांडेड और एर्गोनोमिक, पर घर वाली ख़ुशबू नहीं थी। कभी उसे लगता घर भी ऑफ़िस का ही एक हिस्सा है और वह कभी घर आती ही नहीं है। सच भी तो है पिछले छ: महीनों में वह एक बार भी घर नहीं गयी थी। मात्र सौ किलोमीटर दूरी पर उसका क़स्बा था- सराय अजीतमल, पर वहाँ दिलों की बहुत दूरी थी। पिता के देहांत के बाद माँ ने पिता के एक दोस्त प्रोफ़ेसर वर्मा से लिव-इन रेलशन बना लिए, अब छवि का घर जहाँ वह बाईस साल रही, दो प्रेमियों का अड्डा बन गया, जहाँ उसके पहुँचने से पहले ही उसके जाने के बारे में जानकारी ले ली जाती। कभी-कभी तो उसे अपनी माँ पर आश्चर्य होता कि वह क्या उसके पिता के मरने का ही इंतज़ार कर रही थी। पिता पिछले 5 सालों से कैंसर से जूझ रहे थे इसी कारण छवि को बीच में पढ़ाई छोड़ जॉब करना पड़ी और वर्मा अंकल ने तो मदद की ही थी। यह बात ओर है कि अब उसे ना चाहते हुए भी उन्हें पापा कहना पड़ता।

छवि ने अपने आप को आईने में देखा और थोड़ा मुसकुरायी, वह सुंदर लग रही थी। ऑफ़िस में नौजवान एम्प्लोयी चोरी-छिपे उसे देखने का बहाना ढूँढते और कुछ एक अधेड़ बेशर्मी के साथ कॉफी पीने की रेकुएस्ट करते। मिश्रा सर की चहेती होने से कोई सीधा हमला नहीं बोल पाता। क्या फ़ोन पर रिपोर्टइंग करते समय विनोद सर जान पाते होंगे कि यह एक पंख की कबूतर कांट्रैक्ट की वज़ह से अब तक इस नौकरी को निभा रही है, हाँ..., मिश्रा सर का अपनापन भी एक प्रमुख कारण था कि वह दूसरा जॉब नहीं ढूँढ पाई। क्या पता उन्हें मालूम हो कि ऑफ़िस जाना उसे कितना गंदा लगता है। वह नीचे झुकी, ड्रेसिंग टेबल पर फ़ाइव-स्टार रिज़ॉर्ट में दो दिन और तीन रातों का पैकेज टिकिट पड़ा था। मन किया उसके टुकड़े-टुकड़े कर फाड़ कर फेंक दे। पर उसने केवल एक आह भरी और कमरे की दीवारों को देखने लगी।

दीवालों की सफ़ेदी ने उसे पिछले महीने गोवा में समुंदर किनारे क्लाईंट मीटिंग की याद दिला दी। मन कसैला हो गया। कैसे समुद्र का चिपचिपा नमकीन पानी बार-बार कमर तक टकरा रहा था और दो क्लाईंट उसे अगल-बगल चिपके खड़े थे। उन दोनों की बाहों के किले में वह जकड़ी थी और विनोद सर "से चीज़" कह कर एक ग्रुप फ़ोटो लेने में व्यस्त थे। छवि एक बिन ताज की महारानी की तरह कंपनी और क्लाईंट के बीच होने वाली डील में पिस रही थी। एक लहर ने आ कर उसे गिरा दिया, वह सोचने लगी कि क्या वह सचमुच गिर गयी थी! बस, विनोद सर बीच-बीच में हौसला बढ़ाते रहते, बिज़नस है हँसना तो पड़ेगा।

उनके शब्द याद आते ही उसका मन रोने का किया। उसके लगा इस कमरे की दीवारें सफ़ेद लहरें हैं जो उसके मुँह पर उछल-उछल कर गिर रही हैं। वह ज़मीन पर बैठ गयी और घुटनों को सीने से लगा सुबकने लगी। अपनी कंपनी से एक कांट्रैक्ट साइन कर उसने तीन साल की सैलरी का 60 प्रतिशत हिस्सा पहले ही ले लिया था। सारा पैसा पिता की बीमारी में लग गया। छवि का मन रोने से हल्का हो गया थोड़ी राहत मिली तो उठ कर बेड पर बैठ गयी। डिनर का मन नहीं था इसलिए सो गयी।

सुबह सात बजे सूरज की किरणें जब पर्दे को पार कर आँखों में चुभने लगीं तो हड़बड़ाकर उठी। वह ठीक नौ बजे ऑफ़िस पहुँच गयी, साथ में एक छोटा बैग भी था। मिश्रा सर उसे देख कर हल्का सा मुस्कुराए। वह उनसे भी छुपते हुए जल्दी से अपने कैबिन में आ कर बैठ गयी। एक घंटा प्रेज़ेंटेशन बनायी कि उसे बड़ी थकान लगने लगी, लगता था कल के रोने ने उसकी बहुत ताक़त खींच ली थी। तभी फ़ोन बजा और उसका आलस टूटा। दूसरी लाइन पर मिश्रा सर थे बोले, "तुमने, क्या सोचा?"

ड्रॉअर के नीचे के आख़री खंड में कांट्रैक्ट की कॉपी और मिश्रा सर के साथ उसकी फ़ोटो थी। उसने कांट्रैक्ट को बिना देखे फ़ोटो को उठा अपने बैग में डाल लिया, और बोली, "आपके साथ पार्टनर्शिप," और छवि ने फ़ोन काट दिया। यह कोई पागलपन नहीं था, बल्कि एक सोचा समझा फ़ैसला था। छवि ने ड्रॉअर को ताला लगाया और चाबियों को झिझकते हुए पर दृढ़ता से पर्स में डाल दिया। पंद्रह दिन लगे पर उसे अपने फ़ैसले पर विश्वास था । फ़ोटो को बैग से निकाल कर एक बार फिर देखा, थोड़ा धुँधला लग रहा था पर उसमें अब भी चमक थी। छवि की आँखों में हल्का गीलापन था, कांट्रैक्ट का पैसा मिश्रा सर की हेल्प से भर पा रही थी। अब वह कंपनी में कभी नहीं आएगी। वह अब आज़ाद थी।

पर दो-दिन और तीन रात मिश्रा सर के साथ रिज़ॉर्ट में बिताकर वह उन्हीं के नए फ़्लैट में रहेगी, एक पार्टनर बनकर।


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