अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
01.04.2015


ज़िंदगी-ज़िंदगी

ज़िंदगी अपना बोझ आप ही उठाती है
चलती जाती है
चलती जाती है----

ज़िंदगी
लेकिन है तो ज़िंदगी ही न आखिर
कब तक उठाये
कभी थक भी तो जाती है ------

सो ज़िंदगी को पुचकारते, संवारते रहना चाहिए
और भी इधर उधर बिखरी पड़ी हैं जो
कभी कभी उनको भी निहारते रहना चाहिए -----


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें