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03.14.2015


संवादों पे सांकल

संवादों पे सांकल सटा के लगा दी
कुंडी पे कुंडी जड़े जा रहे
दर-दरवाज़े से दुश्मनी ले ली
दीवारों से कुछ कुछ कहे जा रहे

दस्तक़ लेने देने से बचने
सन्नाटा सन्नाटा बुने जा रहे
इधर ये ज़माना तके जा रहा
उधर अपनी बंसी सुने जा रहे


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