डॉ. अमिता शर्मा

कविता
अथ से अभी तक
आज फिर बाहर चाँदी बिछी है
ज़िन्दगी
ज़िंदगी-ज़िंदगी
नए साल को
बबूल एक शाश्वत सत्य है
मेरी हक़ूमत हैरान है पहले भी परेशान थी..
मेरे गाँव के घर का द्वार
शास्त्र पर सम्वाद जो चाहा
संवादों पे सांकल
समूची धरा बिन ये अंबर अधूरा है
सिंहासन सो रहा है
हम भी होली खेलते जो होते अपने देश
आलेख
महिला दिवस/मौन की संस्कृति