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05.04.2008
 

सोच...
अमित शर्मा


अक्सर मैं कुछ लोगो की
बातों पर बस मुस्काता हूँ
देख कर उनकी सोच समझ
ख़ुद सोच में पड़ जाता हूँ
ये कर देंगे, वो कर देंगे
ये ग़लत है, ये नहीं होने देंगे
नारे वो सब लगाते हैं
काम नहीं कुछ और उन्हें
बस बातों की वो खाते हैं
और बातों में ही वो जीते हैं
आए जब मौका कुछ करने का
दूर नज़र न ये आते हैं
कहना तब इन का होता है
हमने तो बस सोचा था
सोच से कहाँ कुछ होता है
हम तो अकेले ही हैं
अकेले जन से क्या होता है
अब मूढ़ों को कौन बताए
सोच से ही सब होता है
एक अकेला सोच अपनी बदले
देख उसे दूजा फिर सोचे
देख बदलता फिर दूजे को
तीसरे को लगता वो भी सोचे
सोच में वो ताकत
जब बढ़ कर रूप अपना लेले
सिहांसन ख़ुद हिलने लगता है
और समृद्धि का फूल
हर तरफ़ खिलने लगता है ....


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