अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
12.31.2015


चिड़ियाघर

मोहनी मंदिर जाकर आ चुकी थी। राम-राम.... के पवित्र शब्द उसकें मुँह से बार-बार उच्चरित हो रहे थे। वह पूजा के थाल को टेबल पर रखकर तेज़ स्वर में बोली- "रामू-रामू.... कहाँ मर गया? एक-दो बार कहने की सुनता ही नहीं।"

रामू भागते हुए आकर बोला- "जी मालकिन!"

"कहाँ मर गया था? मैंने कितनी आवाज़ दे मारी, तेरी जगह ईश्वर को भी पुकारती तो वो भी एक बार..., एक तू है जो मेरी आवाज़ को अनसुनी कर रहा था।"

"ऐसी बात नहीं मालकिन, मैं आँगन में पेड़-पौधों में पानी डाल रहा था।"

"मैंने कल तुमसे कहा था ना कि इस चिड़िया के घोंसले का बाहर फेंक देना और जालदान की अच्छे से सफाई कर देना। लेकिन तू किसी की सुने तब ना।"

"मालकिन घोंसले में अण्डे हैं।"

"तो क्या हुआ?"

"पाप लगेगा।"

"तू मुझे सीखा रहा है पाप-पुण्य की बातें, मैं रोज दो घण्टे रामायण का पाठ करती हूँ।"

"लेकिन मालकिन..."

"लेकिन-वेकिन को गोली मार, अभी इस घोंसले को बाहर फेंक। ये घर इंसानों के रहने के लिए है, कोई चिड़िया घर नहीं है।"


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें