अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.01.2016


तुम हो

आज तुम्हारे साथ होना या
न होना क्या दोनों अलग हैं?
दो शरीर का मिलन- वह शक्ति,
एक फूल का खिलना,
घिर आती है वसंत संध्या
उस फूल का हाथ थामे,
इससे अधिक कुछ नहीं-
और हम सोचते हैं,
जीवन एक नये रूप में जी उठा फिर,
धरा में घटती हैं अनगिन घटनायें,
ज्वालामुखी का फटना, दरिया का सिमटना,
मुक्त होना देशद्रोही का,
दुराचारी का टहलना सड़क पर,
अकारण गोलियों से विद्ध बगुलों के दल,
पंख बिखेरे मोर,
रात एक बिताने को तुम्हारे साथ,
कितनी ही उनींदी रातों को -
मिलाया है मैंने सुबह से,
कितने ही लोग विलीन हैं मुझमें,
कितनों के अंदर घुला बैठा हूँ,
साथ तुम्हारे एक रात के लिये,
उड़ती तितलियों के झुँड ने,
कितने ही बार भटकाया है पथ मेरा,
भूलवश निकल आया कंठ से वसंत का गीत कोई,
यह गाँव,
कुछ उसी गाँव की तरह,
फिर भी अपरिचित,
अनमेल लगता है,
एक रात जो बिताई है तुम्हारे साथ!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें