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ISSN 2292-9754

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12.26.2015


इंतज़ार

झरते हरसिंगार ने,
रोका है पथ कभी,
जुगनू आँधेरे में,
रातरानी की महक ने,
धकेला है भँवर में?
गुलाब को पाया-
इंतज़ार में गुमसुम?
तो पथिक भूले नहीं तुम,
राह अब तक।


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