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06.27.2007
 
परदेसी सबेरा
अमित कुमार सिंह

सुबह् सुबह् आँख खुली
हो गया था सबेरा
मन में जगा एक कौतुहल‌
कैसा होगा ये
परदेशी सबेरा
बात है उन दिनों कि
था जब मैं लन्दन में
लपक कर उठा मैं
खोल डाली सारी
खि
कियाँ,
भ‌र‌ ग‌या था अब‌
क‌म‌
रे में उजाला
र‌वि कि किर‌नों
पर
अब‌
मैंने
नजर डा
ली
ध्यान से देखा

तो
पाया न‌हीं है
अन्त‌र उजाले की किर‌नों में
स‌बे
रे की ताज़‌गी में
या फिर‌ ब‌ह‌ती सुब‌ह‌
की ठन्डी ह‌वा
ओं में ,
पाया था मैंने उन‌में भी
अप‌नेप‌न‌ का
ह‌सास
ल‌ग‌ता था जैसे कोई
अप‌ना हो बिल्कुल‌ पास
मैंने त‌ब ये जाना
अल‌ग कर
दूँ
अग‌र‌ भौतिकता की
चाद‌र‌ को
तो
पाता
हूँ एक‌ ही
है स‌बेरा
,
चा
हे हो वो ल‌न्द‌न‌
या फिर हो प्यारा
देश‌
मेरा 



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