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06.17.2007
 
भूख
अमित कुमार सिंह

'भूख सुनते ही
होता है अहसास
किसी चाहत का
किसी कमी का
जिन्दगी के दरवाजे पर
बार-बार दस्तक देती
किसी आहट का।

किसी को भूख है
शोहरत की
किसी को है रोजगार की
किसी को वासना की
तो कोई पैसों का
भूखा है।

किसी को ताकत की
भूख है
किसी को सेहत की
तो कोई हुस्न
का दिवाना है
विलासिता का कोई

उड़ता हुआ परवाना है।
भाइयों देखो
क्या आया जमाना है।

मित्र अमिततुम भी
नहीं हो कम
लगी रहती है तुम्हे भी तो
लेखन की भूख हरदम।

नजरें उठा के
देखो
नहीं हो तुम अकेले
भूखों की इस नगरी में
तुमसे भी बढ़कर
हैं अलबेले।

सड़क पर खड़े
उस बेबस-लाचार
बुढ़े
को देखो!
फैले हुए हाथ
,

और आँखों से
छलकती भूख
को तो देखों!

उसकी ये भूख
हमारी भूख से
है बिल्कुल अलग-
खुद की हड्‍डियों
को गलाकर
,
क्षुधा की अग्नि को


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