अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.05.2016


तेरी एक याद बची है

तेरी एक याद बची है-
रात के आँगन में पड़ी
जगती बुझती -
जैसे मैं
जग बुझ रहा हूँ -
एक एक पल
एक एक साँस –
देर बाद राख कुरेदी
हर कण जल रहा था -
मेरी तरह-
ज़िदगी इतनी आसां न हुई
कि दोस्तों को पहन लेता
जैकेट की तरह
एक याद
को क्या कर सकते हो
सिर्फ सजाने के सिवा-
या गले लगाने के सिवा-
आधी रात को जब वो ही याद
उठ कर बैठ जाती है -
कई वर्ष रातें नहीं सोती-
और न ही सोने देती है - चाँद सितारों को -
आप ने कभी ऐसी रातों को देखा है -
न सोते - न रोते


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें