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ISSN 2292-9754

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03.05.2016


आज कुछ न लिखने को

आज कुछ न लिखने को
मन कह रहा है-
लिखता हूँ-
तो कोई आँख आँसू बहाती है-
जहाज़ घर नहीं बैठते
फिर गिराने जाते हैं बम्ब -
मेरे नगर की दीवारें गिरती हैं-
घर तहस-नहस होते हैं-
मिट्टी में मिलते हैं फूल-
क्या ये सब लिखना वर्जित है -
आओ मेरे घर को आग लगा दो -
जो इन शब्दों को जन्म देता है -
जो कहता है कि -
भूखे पेट की बात न कर-
उदास हो जाती है काएनात
लिखूँ तो किस के लिए-
नन्हे बच्चे की भूख की बात करता हूँ
तो महल नहीं सहन करते -
चाँद को फिर न आने को कहता हूँ
तो वो नाराज़ हो जाता है
चलो आज दिन के आँसू पोंछते हैं
आज का दिन निकल जाये आसान
करवट देतें हैं शब्दों को-
कि पवन शीतल चले -
ज़ख़्म न जगे कोई
हो सकता है ऐसे बदल दूँ ये निज़ाम -
बाँट दूँ मुट्ठी भर ईमान -
फिर बंदा बन जाये इंसान!


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