अमर परमार

कविता
एक ज्वार
क्या वो बच जाती?
झोंका
मेला है भाई मेला है
मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता हूँ
शांति
हास्य-व्यंग्य
नेताजी-नेताजी