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ISSN 2292-9754

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03.01.2018


प्रेमचंद: किसानों के हमदर्द

 समीक्ष्य पुस्तक : प्रेमचंद के उपन्यासों में ग्रामीण चेतना
लेखक : डॉ. अजीत कुमार दास
प्रकाशक : पैरोकार पब्लिकेशन कोलकाता
मूल्य : 400 रु०
पृष्ठ संख्या : 268

उपन्यास गद्य-साहित्य की वास्तविक एक जटिल विद्या है। उसका सीधा संबंध मानव-जीवन के साथ जुड़ा हुआ है। जीवन एवं उसकी स्वाभाविक गतिविधियों से कटकर उपन्यास-साहित्य जीवित नहीं रह सकता। वह कला के लिए सिद्धांत का पोषण नहीं करता, बल्कि उसकी कला या शिल्प जीवन से ही उभर कर जीवन को कुछ प्रदान करता है। प्रेमचंद मानते हैं कि-"मैं उपन्यास को मानव-चरित्र का चित्र समझता हूँ। मानव चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्त्व है।"

प्रेमचंद जी ने भारतीय जन-जीवन विशेषत: ग्राम्य जीवन में विद्यमान व्यवस्था-दोषों का उद्घाटन ही अपने उपन्यासों में किया है। समूची व्यवस्था से आमूल-मूल परिवर्तन किए बिना भारतीय ग्राम और सामान्य जनों के जीवन में कोई परिवर्तन संभव नहीं हो सकता। इसी कारण यहाँ उन्होंने परिणाम निकालने या आदर्श थोपने का प्रयत्न नहीं किया। यहाँ वे जीवन जैसे है; उसका वैसा ही चित्रण करते गए हैं। उपन्यास का उद्देश्य भी उदान्त एवं महान है। उपन्यासकार ने कृषक एवं उसके साथ जुड़ी अन्य सस्कृतियों का यथार्थ वर्णन करके, उसकी समग्र व्यवस्था के दोष को हमारे सामने उजागर किया है। साथ ही यह संदेश भी दिया है कि यदि हम सभी वर्गों का हित चाहते हैं, तो हमें शीघ्र ही समूची व्यवस्थाओं को बदलना होगा। व्यवस्था-दोष के कारणों की तह तक पहुँचना होगा और प्रेमचंद जी ने अपने उपन्यासों के माध्यम से उस तह तक पहुँचे हैं। उन्होंने व्यवस्था के कण-कण में पहुँच कर गहराई से झाँका है |

प्रेमचंद जी ने ग्राम-जीवन और वातावरण के समस्त परिस्थितियों को उभारने का सतत एवं निरपेक्ष प्रयास किया है। ग्रामों का प्राकृतिक परिवेश, भौगोलिक स्थितियाँ एवं संरचनाएँ यहाँ एकदम साकार हो उठी हैं। प्राकृतिक वर्णन की एक छोटी-सी झलक देख लेना आवश्यक है- "फागुन अपनी झोली में नवजीवन की विभूति लेकर आ पहुँचा था। आम के पेड़ दोनों हाथों से बौर की सुगंध बाँट रहे थे और कोयल आम की डालियों में छिपी हुई संगीत का गुप्त दान कर रही थी।" इसी प्रकार ग्रामों के सामान्य खाते-जीते घरों का वर्णन देखिए- "द्वार पर बड़ी-सी चरनी थी, जिस पर दस-बारह भैंस खड़ी सानी खा रही थी। ओसारे में बड़ा-सा तख्त पड़ा था, जो शायद दस आदमियों से भी न उठता। किसी खूटी में ढोलक लटक रही थी, किसी पर मंजीरा। एक ताख पर कोई पुस्तक बस्ते में बंधी रखी हुई थी, जो शायद रामायण हो।"

प्रेमचंद ने ग्राम्य परिवेश में पालने वाले पात्रों की आर्थिक,राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों को भी महाकाव्यात्मक परिवेश प्रदान करने का सहज प्रयास किया है। होरी जैसे किसानों की सामाजिक एवं आर्थिक विवशता का चरम रूप हमें उस समय देखने को मिलता है, जब होरी अपनी किशोरी बालिका के होने वाले प्रौढ़ आयु के पति, अपने दामाद से दो सौ रुपए अपने खेत को बेदखली से बचाने के लिए लेता है। उस समय की विवशता का यह अंकन कितना सजीव एवं मार्मिक है "होरी ने रुपये लिए तो उसका हाथ काँप रहा था, उसका सिर ऊपर न उठ सका, मुँह से एक शब्द न निकला, जैसे आसमान से गढ़े में गिर पड़ा और गिरता चला जाता हो।"

ग्राम-जीवन कृषि प्रधान जीवन है। केवल गाँव ही नहीं, हमारे देश की समूची सभ्यता-संस्कृति आज भी मुख्यता कृषि-प्रधान ही है। प्रेमचंद जी ने इस संस्कृति का भी अपने उपन्यासों में सभी दृष्टियों से सजीव,मार्मीक एवं प्रभावी चित्रण किया है। होरी की गाय-पालने की इच्छा कृषक-संस्कृति की निश्चय ही अन्यतम और एकांत इच्छा है, क्योंकि इसे वह सुख-समृद्धि का मूल प्रतीक ही नहीं, कारण भी मानता है। होरी के शब्दों में- "गऊ ही तो द्वार की शोभा है। सबेरे-सबेरे गऊ के दर्शन हो जाए तो क्या कहना।" इसके अतिरिक्त किसान अनेक प्रकार के कष्ट सहन करके भी खेती-बाड़ी छोड़कर अमर्यादित नहीं होना चाहता। इसके अतिरिक्त कृषि-संस्कृति के अनेक प्रकार से किए जाने वाले शोषण का समूचा चित्र उपन्यासों में प्रदशित किया जाता है। उनकी सभी प्रकार की दुखावस्थाओं का मूल कारण उपन्यासकार ने आर्थिक शोषण को ही बताया है। कृषक-संस्कृति में बनियों का महत्व, ब्राह्मणों, ज़मींदार और उसके कारिंदे, थाना-पटवारी, बिरादरी और पंचायत, वैयक्तिक आचार एवं सामाजिक आचार-विचार आदि कोई भी पक्ष यहाँ अछूता नहीं रहता है। यहाँ तक की ग्रामीण लोग ब्राह्मण के घिनौने शोषक रूप को भूलकर भी उसकी पूजा ही करते हैं। शादी-व्याह, रीति-रिवाजों इनके संबंध में किसानों की धारणाएँ आदि कोई भी पहलू अछूता नहीं रहने दिया गया है। उपन्यासकर ने ग्रामीण-सम्मिलित परिवारों और उनके विघटन की दर्दनाक कहानी भी कही है। भीतरी एवं बाहरी गड़बड़ियों को भी प्रेमचंद ने छोड़ा नहीं। तात्पर्य यह है कि कृषक-संस्कृति का समग्र रूप यहाँ साकार होकर उपस्थित होता है। प्रेमचंद के इसी जनवादी दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए प्रसिद्ध आलोचक सत्य प्रकाश मिश्र ने 'प्रेमचंद के श्रेष्ठ निबंध की भूमिका में' उद्धृत किया है- "प्रेमचंद की रचनाओं में सारा भारत अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ मौजूद है। वे सच्चे अर्थों में भारतीय लेखक हैं। इसलिए नहीं कि उन्होंने सामान्यीकरण की रचनात्मक अभिव्यक्ति की है या टाइप चरित्रों का प्रयोग किया है, बल्कि इसलिए कि रचनाओं में हमारा समय और हमारा देश है। भारतीय किसान और मजदूर है।"

शोषण की चक्की में पिसते हुए किसानों तथा मज़दूरों की मुक्ति ही प्रेमचंद के समस्त लेखन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्देश्य रहा है। इसीलिए उन्होंने इनके जीवन से संबंधित समस्त समस्याओं का अत्यंत यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया है। प्रेमचंद जी ने दिखाया है कि दिन-रात मेहनत कर अपना खून-पसीना एक करने वाले ये किसान-मज़दूर भूखे रहते हैं और उनका खून चूसकर जीने वाले ज़मींदार, साहूकार, महाजन, सत्ताधारी लोग तथा उनके सहयोगी वर्ग एशोआराम के साथ अपना जीवन व्यतीत करते हैं। प्राय: ऐसा माना जाता है कि संत्रासमयी स्थितियाँ वास्तव में भाग्य और चरित्र दोष से ही उत्पन्न होती हैं। प्रेमचंद के उपन्यासों के पात्रों में ये दोनों बातें विद्यमान हैं। भाग्य का ख़राब होना तो भारतीय किसान की जन्म-जात नियति है। वह भाग्य दोष मानकर चुप होना ही अच्छा मानता है। एक सीमा तक ही हम इससे सहमत हो सकते हैं। वास्तव में जिस व्यवस्था-चक्र में भारतीय किसान को पिसते हुए दिखाया गया है, ऋण भी समस्या के रूप में उसका एक अंग है। जिसने सदियों से किसान को शोषित और पीड़ित कर रखा है, जिससे निकाल पाने का तब तक कोई उपाय नहीं किया जा सकता है, जब तक उस अव्यवस्थित से व्यवस्था-चक्र को बदला न जाए। बदले बिना यदि किसान उसमें से किसी प्रकार निकालने का प्रयत्न भी करता है, तो भी निकल नहीं पाता। घूम-फिर कर उसे वहीं आ जाना पड़ता है। ऋण ग्रस्तता उसे एक प्रकार से बपौती के रूप में ही प्राप्त हो जाती है, जिसका चक्र तब तक निर्ममता से चलता रहता है कि जब तक बेचारा किसान हताश होकर गिर नहीं पड़ता। तथ्य तो यह है कि किसान का ऋणी होना भी व्यवस्था या भाग्य की ही देन है। डॉ० रामविलास शर्मा का मत है कि "गोदान की मूल समस्या शोषित तथा उत्पीड़ित कृषक के ऋण की समस्या है।"

प्रेमचंद जी ने ग्राम-जीवन का चित्रण जिस पूर्णता के साथ किया है। उससे हमारे सामाजिक जीवन की अपूर्णता स्पष्ट परिलक्षित होने लगती है। गांधी जी तो भारतीय जीवन और समाज की रीढ़ ग्रामों एवं कृषक सभ्यता को स्वीकारते थे, अन्य लोग भी यही मानते हैं। आज यद्यपि भारत में पर्याप्त औद्योगिक विकास हो चुका है, फिर भी हमारी बुनियाद आज भी ग्राम्य एवं कृषक सभ्यता पर ही टिकी है। अत: यदि सभ्यता व्यवस्था या किसी भी अन्य दोष के कारण अपूर्ण है तो निश्चय ही हमारा सामाजिक जीवन अपूर्ण एवं अविकसित है। हम कृषक को निर्बल और असभ्य वर्ग का मानते हैं। उसकी निर्मल निर्बलता एक के बाद एक उसे असभ्य बनाने पर विवश करती जाती है। यह अमानवीय व्यवस्था का ही दोष माना जाना चाहिए। व्यवस्था-दोष या किसी भी कारण से उसी की करुणा और संत्रस्त संवेदना का सजीव चित्रण प्रेमचंद के उपन्यासों में मुख्यत: किया जाता हैं। ग्राम और कृषक जीवन को केंद्र बनाकर प्रेमचंद जी ने व्यवस्था-दोष के समग्र-अंतरंग और बहिरंग तत्त्वों का स्पष्ट वर्णन किया है।

प्रेमचंद ने उपन्यासों में अंत: बाह्य धरातल को कल्पना के अस्वाभाविक एवं भौंडे क्षितिज से उतार कर जीवन के यथार्थ धरातल पर उसे प्रतिष्ठित किया। व्यवहार-जगत के यथार्थ रहस्य-रोमांचों को अपना वर्ण्य-विषय बनाया। घटनाओं के तानों-बानों की उलझी हुई डोरियों को काटकर वहाँ मानव-चरित्रों के विभिन्न रूपों को सजाया सँवारा। झूठे आदर्शों के जंजाल में से उपन्यास-साहित्य को निकाल कर उसे व्यावहारिक यथार्थ के पर्यावरण में सँजोने का अनवरत प्रयास किया। इसका मूल कारण यह यह कि वे इस मान्यता के पोषक थे- "साहित्य समाज और राजनीति में अटूट संबंध है।" अत: उन्होंने व्यावहारिक दृष्टियों से ही जीवन को सामाजिक और राजनीतिक संदर्भों में देखते हुए अपने उपन्यास-साहित्य में ग्रामीण परिवेश को महत्वपूर्ण स्थान स्वीकार किया है।

प्रेमचंद मूलत: पीड़ित मानवता के दुख-दर्दों को प्रबल स्वर प्रदान करने वाले जीवंत कलाकार थे। उन्होंने स्वंय स्वीकार किया था कि वे जीवन की अन्य बातों के समान साहित्य को भी पूर्णतया उपयोगितावादी दृष्टि से देखते थे। वे साहित्य को केवल नायक-नायिकाओं, विछोह-मिलन का चितेरा ही नहीं मानते थे, उसका उद्देश्य मनोरंजन एवं आनंद भी उन्होंने कभी नहीं स्वीकारा। उनका दृष्टिकोण रसवादी भी नहीं था। यदि था भी तो सुख और दुख दोनों का मिला-जुला रस था। इसी कारण उन्होंने अपने उपन्यासों में प्रमुखत: मानवता के मार्मिक दर्द को रूपायित किया है। प्रेमचंद का मानना है कि मानव का स्वभाव तो देव-तुल्य है, परंतु परिस्थितियों की विवशता का राक्षस उसके अंतराल में बैठकर उसे भ्रष्ट कर देता है। सभी जगह एक प्रकार की आपा-धापी मची है। ग्राम हो या शहर सभी जगह वैयक्तिक स्वार्थ ही प्रत्यक्ष है। सभी एक-दूसरे को लूट-खसोट लेना चाहते है। न्याय के रक्षक अधिक उग्र एवं भक्षक बने हुए है। यदि कहीं इन व्यवस्थाओं के प्रति कुछ छ्टपटाहट दिखाई भी देती है तो वह सब व्यवस्था की भीषणता में घुटकर रह जाती है। सामान्य मज़दूर और किसान तो व्यवस्था-चक्र में पिस ही रहा है, ज़मींदार, व्यापारी और मालिक वर्ग भी अपनी ही सीमाओं की विवशता का रोना रो रहा है। तो समाज के ग्रामीण परिवेश में निवास करने वाले किसानों की स्थिति अधिक कष्टमय बनी रहती है जिसका निवारण एक हद तक हो पाता है या नहीं हो पाता है, यह रहस्यमय बना रहता है।

प्रेमचंद समाज के प्रवाह को भली-भाँति समझ रहे थे। उन्हें यह ज्ञात था कि अगर स्वाधीनता हासिल करनी है तो देश की बड़ी शक्ति गाँव, में रहने वाले किसानों की स्थिति और परिवेश में सुधार करना होगा। वे किसानों को अपने अधिकारों के लिए जाग्रत करने की कोशिश कर रहे थे, ताकि किसान अपने अधिकारों को अपने बाहुबल पर शोषक वर्ग से छीन सके, साथ ही साथ किसानों और मज़दूरों का शोषण करने वाले महाजनों, ज़मींदारों की शोषणवृति को समाज के समक्ष उजागर करते हैं। इस संबंध में डॉ. रामविलास शर्मा का मानना है कि - "वह (प्रेमचंद) आगे बढ़ रहे थे, स्वाधीनता-आंदोलन में बढ़ने के लिए उन किसानों का आह्वान करते हुए, जो अब तक पिछड़े थे।" प्रेमचंद ने लगानबंदी को स्वाधीनता-आंदोलन की रीढ़ बतलाया था। उस समय जब लोग कर्ज़ की समस्या को किसान आंदोलन की एक बुनियादी समस्या न समझते थे, प्रेमचंद ने उस पर तेज़ रोशनी डाली थी। वह बराबर कोशिश कर रहे थे, कि आज़ादी का आंदोलन किसानों की बुनियादी समस्याओं को अपने अंदर समेट ले, तथा शोषक वर्गों को जड़ से निर्मूल कर दे।

प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों के द्वारा समाज के माध्यम से व्यक्ति या व्यक्तियों के दुख-दर्द पर प्रकाश डाला है। उन्होंने समाज के मूल में व्यक्ति को रखकर ही उसका अंकन किया है। उनका व्यक्तित्व ही फैलकर समाज बन गया है। इसी कारण ही उनके पात्र व्यक्ति होते हुए भी समूचे समाज का संदर्भ बन गया है। 'साहित्य का उद्देश्य' नामक अपने लेख में प्रेमचंद जी अपने व्यक्ति-संयत-सामाजिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं- "हमारे पक्ष में अंहवाद अथवा अपने व्यक्तिगत दृष्टिकोण को प्रधानता देना वह वस्तु है जो जड़ता, पतन और लापरवाही की ओर ले जाती है और ऐसी कला हमारे लिए न व्यक्ति के रूप में उपयोगी है, न समुदाय के रूप में।" इसी कारण उनकी वर्णित चेतनाएँ व्यक्ति का समाज-मूलक अंकन करने वाली ही प्रमुखत: है, और उपन्यासों में निजी जीवन की अनुभूतियों को ही सामाजिक संदर्भों में सँजोया और चित्रित किया है। जिससे कृषक-संस्कृति का समग्र रूप यहाँ साकार होकर पाठक के मन को बरबस ही आविल कर देता है।

कठिन से कठिनतम स्थितियों में पलने के बावजूद भी प्रेमचंद जी जीवन के प्रति पूर्ण आशा और आस्थावान थे। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी वे हँसना-हँसाना जानते थे। व्यंग्य-विनोद की भी उनके जीवन में कमी न थी। उनके पात्रों एवं अभिव्यंजनाओं में भी हमें हास्य एवं विनोद की स्थितियों के यथेष्ठ दर्शन हो जाते हैं। इस प्रकार प्रेमचंद ने पात्रों के चारित्रिक चित्रण के लिए सरल स्पष्ट भाषा-शैली का ही प्रयोग किया है। ग्राम्य एवं नगरीय पात्रों की भाषा में भी एक स्पष्ट एवं स्वाभाविक अंतर प्रस्तुत है। ग्राम्य भाषा में उन्होंने सहज, स्वाभाविक और व्यवहार आने वाले आँचलिक शब्दों के प्रयोग प्राय: किए है, तथा नगरीय पात्रों की भाषा में उन्होंने बोल-चल की स्वाभाविक अनिवार्यता के अनुरूप अँग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग भी किया है। भाषा की समाहार एवं सामाजिक शक्ति भी प्रेमचंद में अद्भुत थी। जो कि एक साथ बहुत थोड़े शब्दों में कई पात्रों के मनोभावों, उनकी चारित्रिक दुर्बलताओं एवं सबलताओं को बिल्कुल स्पष्ट रूप से हमारे सामने बिंबित कर देते हैं। ऐसे करते समय प्रेमचंद जी ने सहज-स्वाभाविक भावभिव्यक्ति के लिए प्रचलित उर्दू, अरबी और फारसी शब्दों का प्रयोग भी मुक्त-भाव से किया है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रेमचंद भाषा-शैली के अद्भुत शिल्पी थे। अभिव्यक्ति एवं भाषा आदि की पध्दतियों की सबसे बड़ी सफलता एवं विशेषता यही है कि वह सर्जक कलाकार की भावनाओं को सभी दृष्टियों से संप्रेषणीय बना सके। पाठक उसके समग्र भाव-बोध को सहज ही अपनाकर आविर्भूत हो सके। वह किसी भी प्रकार की दुरूहता एवं उबाहट का अनुभव न करे।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि प्रेमचंद एक ग्रामीण परिवेश के कथाकार है जो उन्होंने अपने आँखों से देखा और अनुभव किया उसका सच्चा चित्र उन्होंने समाज के समक्ष प्रस्तुत किया है। एक व्यापक परिवेश में उन्होंने सभी प्रकार के पात्रों के चरित्र को रूपायित करने का सफल प्रयास अपने उपन्यासों में किया है। इसके अतिरिक्त ग्रामीण पात्रों के नाम, वेश-भूषा, क्रिया-कलाप, शारीरिक गठन, बातचीत के ढंग एवं सरल भाषा आदि भी समग्रतः ग्राम परिवेश के अनुकूल है। इस प्रकार कह सकते हैं कि- प्रेमचंद ठेठ गँवई कि खाद थे। उनका सारा जीवन कठिनाइयों के साथ सतत-संघर्ष का एक मधुर प्रयत्न रहा है और साहित्य क्षेत्र में उनकी आन का सबसे बड़ा कारण उनकी पीड़ित आत्म-चेतना ही रही है। यह वेदना ही साहित्य में अमर होकर वरदान हो गई।


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