अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
10.13.2014


मध्यकालीन हरियाणा का शिखर वैज्ञानिक: ठक्कर फेरू

हरियाणा प्रदेश का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि पूरे उत्तरी भारत का ज्ञात इतिहास। हड़प्पा काल के अनेकानेक चिह्न मिलने के बाद इतना तो स्पष्ट ही है कि यहाँ कि धरती बेहद प्राचीन अवशेषों को आज भी अपने में समेटे है। लेकिन इतना प्राचीन इतिहास होने के बाद भी कुछ ऐसा दृष्टिकोण बन गया है कि यह राज्य मात्र कृषि और उससे संबंधित काम-धंधों के लिए ही ज़्यादा मशहूर हो गया है। इतनी प्राचीन संस्कृति वाले राज्य में प्राचीन काल से निश्चित ही कई क्षेत्रों में तरक्की हुई होगी। इन सारे क्षेत्रों में विज्ञान और तकनीकी एक बेहद महत्वपूर्ण पक्ष है। अगर हमसे पूछा जाए कि प्राचीन हरियाणा में क्या कोई वैज्ञानिक हुआ है? - तो हमें स्मृति पर ज़ोर डालना पड़ता है। ऐसा ही एक नाम जो विद्वानों में ज्ञात एवं सुप्रसिद्ध होते हुए भी हरियाणवी समाज में एक आइकॉन नहीं बन पाया, वह है अपूर्व मेधावी वैज्ञानिक - ‘ठक्कर पेरू’। (जिन्हें कहीं-कहीं ठाकुर फेरू भी कहा गया है।)

पहला प्रश्न तो यही है कि क्या यह सर्वमान्य है कि ठक्कर फेरू हरियाणा से ही थे? इसका उत्तर यह है कि ज़्यादातर ऐतिहासिक प्रमाण और विद्वान इसी तरफ इशारा करते हैं कि वह हरियाणा से ही थे। आइए, इसकी जाँच के लिए हम एक-एक करके उपलब्ध साक्ष्यों की जाँच करें।

क) हरियाणवी इतिहासकार और प्रसिद्ध विद्वान के.सी. यादव के अनुसार ठाकुर फेरू (प्रोफेसर यादव जी ने ठक्कर की जगह ‘ठाकुर’ शब्द को वरीयता दी है)। दादरी के समीप किनाना गाँव के रहने वाले थे। उनके अनुसार सल्तनत युगीन ग्रंथों में ठाकुर फेरू के ग्रंथ अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। (हरियाणा-इतिहास एवं संस्कृति के.सी. यादव, 1992 मनोहर पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स)

ख) श्री मंगीलाल भूतोरिया ने अपनी किताब ‘इतिहास की अमरबेल - ओसवाल जाति का इतिहास’ (मुंशीलाल-मनोहरलाल प्रकाशन) में बताया है कि अलाउद्दीन खिलजी ने हरियाणा में कन्नाना नामक जगह से ‘ठक्कर फेरू’ नामक एक श्रीमल जैन को अपना खजांची नियुक्त किया। विकीपीडिया पर उपलब्ध ‘दिल्ली में जैन’ (जैनाज़ इन डेली) नामक लेख में इसे संदर्भ सहित उद्धृत किया गया है। हालांकि यह बात भी गौरतलब है कि विकीपीडिया पर लेखों में समय-समय पर संपादन और फेर-बदल होता रहता है।

ग) बी.एम. चिन्तामणी ने 1971 में एक शोध पत्र लिखा। इसका विषय 13 प्राकृत पांडुलिपियों पर था। इस शोध पत्र में उन्होंने ठक्कर फेरू के संबंध को कन्नाना से ही जोड़ा। पर इसके साथ उन्होंने यह भी लिख दिया कि यह कन्नाना गुजरात में है। हालांकि इस बात का कोई आधार नहीं बताया गया कि कन्नाना (जोकि वास्तव में आज का किनाना है) गुजरात में किस प्रकार तय किया गया। लेकिन इतना वह भी मानते हैं कि ठक्कर फेरू ने अपने जीवन का अधिकांश भाग दिल्ली में बिताया।

घ) जिन लेखों या इंटरनेट उद्धरणों में ठक्कर फेरू को दिल्ली का बताया गया उसे हरियाणा ही समझना चाहिए क्योंकि जैन विद्वान दिल्ली को हरियाणा में ही मानते रहे हैं। आज की वर्तमान दिल्ली भी तीन तरफ से हरियाणा से ही घिरी है। इसको स्पष्ट करने के लिए अपभ्रंश के प्राचीन लेखक एवं कवि विबुद्ध श्रीधर (विक्रमी 1189-1230) को उद्धृत करना उपयुक्त होगा -

हरियाणाए देसे असंखगाम,
गामियण जणि अणवरथ काम,
परचक्क विहट्टणु सिरिसंघट्टणु,
जो सुख इणा परिगणियं।
रिउ सिहिरावट्टणु विउलु षवट्टणु
ढिल्ली नामेण जि भणियं।
(एन अर्ली अटैस्टेशन ऑफ टोपोनिम ‘ढिल्ली’, रिचर्ड जे. कोहेन)

अर्थात् हरियाणा में अनगिनत गाँव हैं। वहाँ लोग परिश्रम करते हैं। वे दूसरों का आधिपत्य स्वीकार नहीं करते और दुश्मन का रक्त बहाने में प्रवीण हैं। इन्द्र स्वयं इस देश की प्रशंसा करते हैं। इस देश की राजधानी ‘ढिल्ली’ है। ज्ञातव्य है कि उस समय दिल्ली को ‘ढिल्ली’ कहा जाता था।
अतः कुल मिलाकर ज़्यादातर तथ्य फेरू के हरियाणवी संबंध की ओर इशारा करते हैं।

ठक्कर फेरू के महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अवदान -

प्रतिभाशाली वैज्ञनिक-अन्वेषक ठक्कर फेरू ने प्रयोगात्मक विज्ञानों में अनेकानेक क्षेत्रों में काम किया। चाहे वे रसायनशास्त्र हो, गणित हो, वास्तु हो या भू-विज्ञान। ठक्कर फेरू के गणित के सूत्र पर एक पूरा शोध पत्र इंडियन जर्नल ऑफ हिस्ट्री ऑफ साइंस में प्रकाशित हुआ है।

ठक्कर फेरू के कार्यों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-

प) रत्न परीक्षा - इसमें ठक्कर फेरू ने विभिन्न रत्नों जैसे मुक्ता, पुखराज, हीरा, इन्द्रनील, गोमेद और वैदूर्य आदि की पहचान, जाँच और इस्तेमाल के बारे में लिखा।

पप) वास्तु सार - इस ग्रन्थ में वास्तुशास्त्र के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है। भूमि की जाँच के लिए भूमि-परीक्षा, भूमिलक्षण आदि विषयों पर चर्चा की गई है।

पपप) धातुत्पत्ति - धातुत्पत्ति में विभिन्न धातुओं, जैसे तांबा, सीसा, जस्ता और पारा आदि के बारे में वर्णन है।

पअ) इसी प्रकार दो अन्य ग्रन्थ द्रव्यपरीक्षा और भूगर्भपरीक्षा भी उपलब्ध है।

द्रव्य परीक्षा में अलाउद्दीन खिलजी के समय में मुद्राएँ/सिक्के ढालने की तकनीकों का विस्तार से वर्णन है। परमेश्वरी लाल गुप्ता के लेखों का एक संग्रह ‘कॉयन्स एण्ड हिस्ट्री ऑफ मिडिएवल इंडिया’ के नाम से प्रकाशित हुआ था। इसमें एक पूरा लेख खिलजी सल्तनत के दौर में सिक्के बनाने की प्रक्रियाओं पर है। इस पूरे अध्याय में अध्ययन का आधार ठक्कर फेरू की ‘द्रव्य परीक्षा’ को बनाया गया है। ठक्कर फेरू अलाउद्दीन खिलजी के शासन के दौरान दिल्ली टकसाल के प्रभारी थे।

ठक्कर फेरू के ग्रन्थों का प्रकाशन रत्नपरीक्षादि सप्तग्रंथसंग्रह के नाम से राजस्थान पुरातन ग्रंथमला जोधपुर से हुआ है। द्रव्य परीक्षा का प्रकाशन जैन इंडोलॉजिकल इंस्टीट्यूट, वैशाली (1976) ने किया है।

ठक्कर फेरू का गणित पर भी एक ग्रंथ ‘गणितसार कौमुदी’ नाम से है। महावीर (9वीं सदी) ने उत्तल या अवतल गोलीय पृष्ठों से संबंधित एक सूत्र दिया था। बाद में इस सूत्र को ठक्कर फेरू ने और बेहतर बनाया। इसे महावीर-फेरू सूत्र भी कहा जाता है। ठक्कर फेरू को ऐसे गोलीय पृष्ठों पर कार्य करने की आवश्यकता कैसे पड़ी होगी? चूँकि फेरू साथ-साथ वास्तु-निर्माण कलाओं पर भी काम कर रहे थे और निर्माण कार्य में गुम्बदों, मेहराबों से काफी वास्ता पड़ता रहता है। अतः फेरू ने उनके गणित पर भी काम किया होगा।

एक बात जो समझना ज़रूरी है। वह यह है कि फेरू का पूरा काम व्यावहारिक विज्ञानों से संबंधित है। यह भारतीय विज्ञान की विशेषता रही है कि उसने अमूर्त (Abstract) सिद्धान्तों का जाल खड़ा नहीं किया बल्कि हमेशा जीवन से संबंधित ज़रूरतों से शुरूआत की। यदि ठक्कर फेरू की ग्रंथावली पर नज़र डालें तो देखते ही यह खुद-ब-खुद साफ़ हो जाएगा।

आज ज़रूरत इस बात की है कि ठक्कर फेरू जैसी महान शख्सियत को आम जनता के बीच ले जाकर एक जाना पहचाना नाम बनाया जा। हरियाणवी विज्ञान की जड़ों की पहचान हम सबका सामूहिक उत्तरदायित्व है।

अमनदीप वशिष्ठ
भौतिकी प्राध्यापक
फोनः 9729482329


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें