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ISSN 2292-9754

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03.13.2015


समर्थ शिक्षा एवम् वर्तमान शिक्षा

सर्वप्रथम हमारे साहित्य मस्तिष्क में विचार आता है कि समर्थ शिक्षा क्या है? क्या वर्तमान शिक्षा इसके अर्न्तगत आती है या नहीं। पहली बात तो यह है कि इस विषय पर हमें विचार करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? जबकि आकड़ों पर नज़र डा़लें तो हमारे देश में शिक्षा का स्तर शत प्रतिशत (जिसे हम साक्षरता प्रतिशत भी कह सकते हैं) के आस-पास है। एवं उच्च शिक्षा की बात करें तो वैज्ञानिकी एवं तकनीकी रूप से भारत विश्व में अपना आधिपत्य स्थापित कर चुका है। परन्तु फिर भी हमे इस विषय पर विचार करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसका अर्थ है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली पूर्ण रूप से समर्थ शिक्षा में नहीं आती परन्तु क्यों?

हम प्राचीन शिक्षा पद्धति की ओर ध्यान दें - प्राचीन काल में गुरु-शिष्य परम्परा रही। इस शिक्षा पद्धति में गुरु द्वारा अपने आश्रम (आज इसे सामान्य रूप विश्वविद्यालय/विद्यालय कहा जा सकता है) में शिष्य का शारीरिक मानसिक विकास करके समाज एवं देश हित में नैतिक एवं मानवीय गुणों को गुरु द्वारा सम्प्रेषित किया जाता था। या हम यों कहें कि प्राचीन शिक्षा प्रणाली में गुरु द्वारा दी गई शिक्षा (ज्ञान) का लक्ष्य शिष्य में मानवीय एवं नैतिक गुणों का विकास करना था, जिनका उपयोग वह अपने जीविकोपार्जन के साथ-साथ समाज एवं देश में फैली विसंगतियों, विद्रूपताओं को दूर कर चेतना लाने एवम् समाज में मानवीय एवं नैतिक गुणों को प्रतिस्थापित करने में करते थे।

अब प्रश्न उठता है कि इस शिक्षा एवं शिक्षा नीति को समर्थ शिक्षा कहें और वर्तमान शिक्षा प्रणाली को इस सन्दर्भ में देखें तो क्या वर्तमान शिक्षा समर्थ शिक्षा को अर्न्तगत माना जा सकता है या नहीं, अगर नहीं तो क्यों? यह विचारणीय है।

हम भारत के शिक्षा के स्तर पर विचार करें। हालँकि हम मानते हैं कि स्वतंत्रता के बाद देश में शिक्षा का स्तर बहुत तेज़ी से बढ़ा। संविधान में शिक्षा को मूल अधिकार मानना, ग्रामीण क्षेत्र में प्रांरभिक, उच्च माध्यमिक विद्यालयों की स्थापना, उच्च शिक्षा की बात करें तो नये विश्व-विद्यालयों की स्थापना, निजी विश्व-विद्यालयों की स्थापना, एवं शैक्षिक स्तर को सुधारने हेतु केन्द्र एवं राज्य सरकारों का ग्रामीण साक्षरता मिशन प्रस्तुत तथ्य उच्च शैक्षिक स्तर को दर्शाता है परन्तु फिर भी वर्तमान शिक्षा निति समर्थ शिक्षा के दायरे में नहीं आती क्यों?

मैं इसके प्रमुख कारण यह मानता हूँ कि वर्तमान शिक्षा स्वरूप पूर्ण रूप से मानवीय एवं नैतिक गुणों को प्रतिस्थापित नहीं कर पा रही है, चाहे वह माध्यमिक स्तर हो या उच्च स्तर। इस सन्दर्भ में हम विद्यालयों एवं विश्व-विद्यालयों में पढ़ाये जा रहे विषयों को देखें, तो जो विषय बच्चे या विद्यार्थी में शारीरिक एवं मानसिक विकास एवं मानवीय, नेतिक गुणों को प्रतिस्थापित करने में सहायक थे, उनको शैक्षिक पाठ्यक्रम से नज़र अन्दाज़ कर दिया गया एवम् विदेशी शिक्षा नीति अनुसार पाठ्यक्रमों में बदलाव किया गया।

उदाहरण के तौर पर एल.के.जी., यू.के.जी.(प्राथमिक स्तर) पर विद्यालय अंग्रेज़ी का ढोल पीटते नज़र आयेंगे। उच्च शिक्षा की बात करें तो वैज्ञानिक एवं तकनीकी विषयों पर सरकार का ध्यान है। अगर किसी विद्यार्थी को पूछें कि आप बी.टेक., एम.टेक. एम.बी.ए. की डिग्री क्यों ली तो उसका जवाब होगा अच्छे पैकेज के लिये। विडम्बना यह है कि शिक्षा को आज पैकेज के स्तर पर रखकर तौला जा रहा है। मानवीय एवं नैतिक गुणों की तो उसे परिभाषा तक नहीं आती। हालाँकि भूमण्डलीकरण के दौर में जीविकोपार्जन के लिये उच्च शिक्षा आवश्यक है और यह भी मानते हैं कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भारत ने अपना विश्व में स्थान स्थापित किया है। पर इस शिक्षा नीति में हो रह मानवीय एवं नैतिक पतन के ओर भी ध्यान देना आवश्यक है।

हम उन विषयों पर नज़र डालें जो हमारे नैतिक, मानसिक, शारीरिक विकास में सहायक होते हैं। आज विद्यालय एवं विश्व-विद्यालयों में कला संकाय एवं भाषा संकाय को विज्ञान एवं तकनीकी संकाय की तुलना में कम महत्व दिया जा रहा है, जो हमारे शारीरिक मानसिक एवमं नैतिक विकास में सहायक हैं। उदाहरण के तौर पर हम राजस्थान की बात करें तो राजस्थान में वर्तमान समय में सरकार द्वारा आदेश निकाला गया कि हर पंचायत स्तर पर विज्ञान संकाय खोला जायेगा। प्रस्तुत आदेश उच्च शिक्षा स्तर, एवं उच्च शिक्षा नीति को दर्शाता है पर कला एवं भाषा संकाय को दरनिकार करना क्या उचित है?

जो संकाय या विषय मानवीय एवं नैतिक मूल्यों की स्थापना करने या यों कहें कि सहायक है उन संकायों को सरकार अपनी शिक्षा नीति में स्थान देने में हिचकिचा रही है। अब बात करें उच्च शिक्षा की - राजस्थान में जो विश्वविद्यालय हैं इनमें- बीकानेर विश्वविद्यालय, कोटा विश्वविद्यालय, अजमेर विश्वविद्यालय में आज भी हिन्दी विभाग (कलासंकाय) जिस भाषा को राजभाषा का दर्जा देते हैं, नहीं है। जबकि अन्य विज्ञान से संम्बधित संकाय हैं। अन्य निजी क्षेत्र के विश्वविद्यालयों में वैज्ञानिक एवं तकनीकी पाठ्यक्रम है पर कला एवं भाषा संकाय का अभाव है।

विचारणीय प्रश्न है कि क्या विद्यार्थी का तकनीकी उपाधि लेना ही शिक्षा है? अतः निष्कर्ष रूप यों कहें कि आज वर्तमान शिक्षा स्वरूप भले ही उच्च श्रेणी का है पर इस शिक्षा पद्धति में मानवीय एवं नैतिक विकास करने वाले संकायों, पाठ्यक्रमों को दरनिकार किया जा रहा है। हालाँकि इसका मुख्य कारण भूमण्डलीकरण को माना जा सकता है परन्तु फिर भी सरकारी उच्च शिक्षा प्रभाग के लिए आवश्यक है कि समाज और देश में नैतिक एवं मानवीय मूल्य की स्थापना हेतु, सहायक संकायों विषयों एवं सहायक योजनाओं को प्राथमिकता से उच्च स्तर की शिक्षा नीति में सम्मिलित करे ताकि विद्याथियों का मानसिक, शारीरिक एवं नैतिक विकास हो सके एवं वह देश समाज में उनको प्रतिस्थापित कर सके। तभी हम अपनी शिक्षा को समर्थ शिक्षा कह सकते हैं। हालाँकि विज्ञान एवं तकनीकी विषय देश के विकास में विश्व स्तर पर आवश्यक हैं पर अन्य संकाय जो मानवीय एवं नैतिक मूल्य की स्थापना कर सकें उनको भी अपने वर्तमान शिक्षा नीति में स्थान देना आवश्यक है।

डॉ. एलोक शर्मा
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