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ISSN 2292-9754

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01.19.2016


आदिवासी जीवन संघर्ष का मूल कारण "अशिक्षा"
("टीस" कहानी के आधार पर)
डॉ. एलोक शर्मा*; आशीष कुमार गुप्ता**

"आदिवासी" शब्द आते ही हमारे मस्तिष्क में प्रश्न उठता है कि आदिवासी कौन हैं और जो तस्वीर इस शब्द को सुनकर जनसामान्य के मन मस्तिष्क में उभरती है, उसको हम भाषा के माध्यम से व्यक्त करें : जंगलों, पहाड़ों, कन्दराओं में निवास करने वाले, भूखे, नंगे, शरीर पर जानवरों की खाल लपेटे, नाक कान छिदे हुये, अशिक्षित, अंधश्रद्धा, अपनी संस्कृति, परम्पराओं को सँजोये, सभ्य समाज से दूर, संवैधानिक अधिकारों से वंचित जातियों को आदिवासी कह दिया जाता है। पर इस परिभाषा में व्यक्त शब्दों पर ध्यान दें, तो क्या इस भूमण्डलीकरण के दौर में भारत ऐसा वर्ग हो सकता है, अगर हाँ, तो यह विचारणीय है, जहाँ एक और भारत सम्पूर्ण विश्व में अपना हर क्षेत्र में परचम स्थापित कर चुका है, दूसरी और देश में समाज का ऐसा आईना है, जो आज भी बेघर, सभ्य समाज से दूर, संवैधानिक अधिकारों से वंचित है एवं पिछड़ा हुआ है। हम जब आदिवासी जीवन एवं संघर्ष की बात कर रहे हैं, तो प्रश्न यह भी उठता है कि जीवन संघर्ष किससे, क्यों एवं संघर्ष का मूल कारण क्या?

इन प्रश्नों का उत्तर हम खोजें तो हमारे सामने एक ऐसी तस्वीर आयेगी, जिसको आज भी नज़रअन्दाज़ किया जा रहा है। हम जब संघर्ष की बात करते हैं, तो हमें पूरे भारत में बिखरे पड़े आदिवासी समुदाय के जीवन एवं उनकी परिस्थितियों से अवगत होना होगा। जानते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है, साहित्यकार अपने साहित्य के माध्यम से वही व्यक्त करता है, जो समाज में घटित होता है।

हम हिन्दी साहित्य पर पैनी नज़र डालें, तो इस भूमण्डलीकरण के दौर में नई विचारधाराओं एवं नई धारणाओं का समावेश होता नज़र आता है, जिनमें दलित विमर्श, स्त्री विमर्श एवं आदिवासी विमर्श आदि विचारधाराओं ने हिन्दी साहित्य को नई दिशा प्रदान की। "आदिवासी विमर्श" के रचनाकारों ने आदिवासी जीवन को केन्द्र में रखकर उनकी जीवन-शैली, लोक-व्यवहार, पीड़ा, संघर्ष एवं उन पर हो रहे शोषण एवं संघर्ष के प्रति जन सामान्य एवं प्रशासन का ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास किया। इन्हीं प्रश्नों को लेकर हिन्दी रचनाकारों ने अपना साहित्य लिखा, जिनमें रांगेय राघव, राजेन्द्र अवस्थी, संजीव ठाकुर, मैत्रीय पुष्पा, वीरेन्द्र जैन प्रमुख हैं, जिन्होंने वन और जंगलों में निवास करने वाली गौढ़, भील, कातकारी, मीझो, नागा, कोल, धारु आदि आदिवासी जनजातियों के जीवन को यथार्थ रूप से अपने साहित्य में चित्रित किया।

संजीव ठाकुर हिन्दी कथा साहित्य के सातवें-आठवें दशक के कथाकार हैं, जिन्होंने हिन्दी कथा जगत को एक नई दिशा प्रदान की। उन्होंने अपने लेखकीय जीवन में आदिवासी स्थानों पर भ्रमण किया एवं उनकी संवेदनाओं, अनुभूतियों, जनजीवन में व्याप्त विषमताओं, विसंगतियों को स्वयं अनुभव कर अपनी लेखनी के माध्यम से जनसामान्य एवं शासन प्रशासन द्वारा आदिवासियों पर हो रहे शोषण चक्र एवं जीवन में व्याप्त संघर्ष को यथार्थ रूप से अभिव्यक्ति प्रदान की। इनके द्वारा रचित उपन्यासों में धार, जंगल जहाँ शुरू होता है, सावधान नीचे आग है, सर्कस, किशनगढ़ का अहेरी, सूत्रधार, पाँव तले की दूब एवं कहानियों में "टीस", अपराध, प्रेतमुक्ति, ऑपरेशन जोना की महत्वपूर्ण हैं।

संजीव की "टीस" कहानी ने आदिवासी समाज, उस पर हो रहे शोषण, संघर्ष की कथा को यथार्थ रूप से प्रस्तुत किया। इस कहानी में संजीव ने सरकार की आदिवासियों के उत्थान के लिए बनायी योजनाओं, संस्थाओं के नाम पर शासन प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर किया। साथ ही आदिवासी का ज़मींदार, साहूकार, पुलिस प्र्शासन द्वारा इनके हो रहे शोषण एवं संघर्ष को व्यक्त किया।

प्रस्तुत कहानी में कथाकार संजीव ने काकड़ड़ीहा ग्राम में रहने वाले आदिवासी जनजाति के जीवन संघर्ष, शोषण, सामन्ती व्यवस्था, पुलिस प्रशासन एवं सरकारी योजनाओं को व्याप्त भ्रष्टाचार को यथार्थ अभिव्यक्ति दी। इस कहानी में लेखक ने नायक शिबू काका के माध्यम से सपेरा आदिवासी जनजाति पर हो रहे अत्याचार, शोषण को व्यक्त किया। कहानी के प्रारम्भ में शिबू काका का संघर्ष तक प्रारम्भ होता है, जब ठेकेदारों द्वारा खदान को शुरू होने पर काका की ज़मीन (खेत) उनसे हड़प लिया जाता है। ग्राम के सभी व्यक्ति अधिकारियों एवं ठेकेदारों के चंगुल से बचकर विस्थापित ज़िन्दगी जीने को मजबूर हो जाते हैं।

ऐसे देखा जाये, तो इस भूमण्डलीकरण के दौर में आदिवासी जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष है ज़मीन, क्योंकि भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था के चलते आज आदिवासियों के जीवन जीने के स्थानों को छीना जा रहा है एवं उन्हें विस्थापितों की तरह अपना जीवन यापन करना पड़ता है। शिबू काका को वापस अपना पुश्तैनी धंधा "सपेरा" से अपना घर चलाने को मजबूर होना पड़ता है, जिसे उनके पिता ने मरते समय यह धंधा छोड़ने के लिए कहा था। आगे कहानी में पुजारी पंचानन का शिबू काका की पत्नी मताई का शारीरिक शोषण करना, मताई की शिबू काका के द्वारा हत्या एवं उसके पश्चात् शिबू काका पर पुलिस द्वारा यातना, एवं अन्त में उसे पागल क़रार करना आदि घटनायें सपेरा आदिवासी जाति के शोषण एवं संघर्ष का मार्मिक चित्र प्रस्तुत करता है।

आदिवासियों के पास उनके जीवन जीने के साधनों, जंगल, ज़मीन, जल तीनों थे। उसने अपनी सांस्कृतिक विरासत को सदियों से संभाल कर रखा एवं वह आत्मसम्मान के साथ जीवन जीत रहा। लेकिन आज उसकी सामाजिक संरचना, प्राकृतिक जीवन, स्वतन्त्रता, विकास एवं औद्योगिकीकरण के नाम पर हो रहे विस्थापन से ख़तरे में आ गया। आदिवासियों की वन सम्पदा से युक्त कृषि योग्य भूमि में खनिज भण्डार होने के कारण वे औद्योगिक स्थानों में परिवर्तित कर दी गई। खनिज भण्डार होने के कारण पूँजीपति वन अधिकारी, सरकारी अफ़सर, शासन एवं प्रशासन मिलकर आदिवासियों को डरा-धमका कर या लालच देकर ज़मीन पर कब्ज़ा जमाते हैं। इसी कारण आदिवासी जातियाँ विस्थापित होकर रोज़ी-रोटी की तलाश में शहरों में आकर अपनी रोज़ी-रोटी के लिए अपने पुश्तैनी धंधा करना पड़ता है, जिससे उन्हें दो वक़्त की रोटी भी नसीब नहीं होती, बल्कि शहरी सभ्य कहे जाने वाले लोगों से अन्याय, अत्याचार एवं मानसिक शोषण ही मिलता है। अतः इस भूमण्डलीकरण के दौर में आदिवासी जीवन का संघर्ष है - रोटी, कपड़ा और मकान (घर) एवं उनके हर स्तर पर हो रहा शोषण।

हम संजीव की "टीस" कहानी को आधार मानते हुये सम्पूर्ण भारत के अलग-अलग राज्यों में निवास करने वाली लेपचा, भूरियाँ, चारु, बुक्सा, जॉनसारी, खाम्पटी, कनोटा, हमर, बुकी, लुसाई, मोनपास, जुआंग, खोड़, भूमिज, खरिया, मुड़ा, संयाल, उंटाव, गौड़, बैगा, मारिया, भील, मीणा गरासिया, डामोर, सहरिया, कंजर, सांसी, महादेव, काली, डसला आदि आदिवासी जातियाँ अपने जीवन को बचाने के लिये संघर्षरत हैं।

एक और भूमण्डलीकरण के दौर में देश की प्रगति को आधार लेकर शासन प्रशासन, औद्योगिक एवं शहरी विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों को नीलाम किया जा रहा है, इसका प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से नकारात्मक प्रभाव आदिवासी जीवन पर पड़ रहा है एवं निजी लाभ एवं शासन प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते आदिवासियों को अपने पैतृक स्थान से आवास योजनाओं का झाँसा देकर बेघर किया जा रहा है। दूसरी तरफ अशिक्षित होने के कारण शिबू काका के समान अपने जीवन व्यापन करने हेतु अपना पैतृक व्यवसाय करने को मजबूर होना पड़ता है। साथ ही शारीरिक, मानसिक शोषण को झेलना पड़ता है।

पूर्ण कथावस्तु का विश्लेषण करें कि आदिवासियों के साथ हो रहे शोषण के प्रति आवाज़ क्यों नहीं उठाते एवं इसका मूल कारण क्या है? विश्लेषणानुसार उनका अशिक्षित होना, क्योंकि जब तक किसी व्यक्ति विशेष या समुदाय को अपने अधिकारों का पता नहीं होता तब तक उसका शारीरिक एवं मानसिक स्तर पर शोषण होता रहा है एवं हम यह भी जानते हैं कि अधिकारों या यों कहें संवैधानिक मूल अधिकारों की जानकारी में शिक्षा महत्वपूर्ण स्थान रखती है। शैक्षिक होने पर ही वह समुदाय अपने मूल अधिकारों से परिचित हो पायेगा एवं अपने साथ हो रहे शोषण के प्रति आवाज़ उठा पायेगा।

हम शैक्षिक स्तर की बात करे तो भारत सरकार एवं राज्य सरकारों ने उनके शैक्षिक स्तर हेतु संवैधानिक स्तर पर आरक्षित सूची में स्थान दिया। साथ साथ ट्राइबल डवलपमेण्ट विभाग, एनएसटीएफडीसी, शबरी आदिवासी विकास मण्डल, आदिवासी शिक्षा योजना, आदिवासी महिला सशक्तीकरण योजना एवं देश भर में कई आदिवासी शैक्षिक प्रोजेक्ट्स चला रखे हैं एवं कई आदिवासी (जनजाति) आवासीय योजनायें भी चला रखी हैं।

पर विचारणीय प्रश्न यह है कि इन महत्वपूर्ण योजनाओं का लाभ उन आदिवासियों को मिल पा रहा है या नहीं? अगर पूर्ण रूप से नहीं तो इनका क्या कारण है? प्रथम कारण तो यह है कि अशिक्षित विस्थापित आदिवासियों को सरकार द्वारा आवास तो दिये जाते हैं, पर वो ऐसे स्थानों पर होते हैं, जहाँ भौतिक सुविधाओं का अभाव होता है। दूसरा कारण अशिक्षित एवं संवैधानिक अधिकारों की जानकारी न होने के कारण उनका सभ्य समाज द्वारा शोषण हाना।

सरकार द्वारा चलाई जा रही शैक्षिक योजनाओं की बात करें, तो क्या इन शैक्षिक योजनाओं का लाभ आदिवासियों को हुआ? क्या उनका शैक्षिक स्तर बढ़ा या नहीं? विचारणीय है हम पूरे देश में से राजस्थान राज्य के आदिवासी शैक्षिक स्तर की बात करें, तो आज भी प्रशासनिक सेवाओं, अध्यापक विज्ञप्तियों एवं अन्य रोज़गार विज्ञप्तियों में आदिवासी जनजातियों, जैसे सहरिया, ग्यारसिया, भील आदि का स्थान आरक्षित तो होता है, पर परीक्षा परिणाम पर नज़र डालें, तो ये आरक्षित स्थान लगभग रिक्त होते हैं। इन आँकड़ों को देखा जाये, तो आदिवासी शिक्षा का स्तर आज भी उस स्तर तक नहीं है, जहाँ उसे होना चाहिये। जब सरकार ने आदिवासी शैक्षिक योजनायें देश भर में चला रखी हैं, तो उनका पूर्ण लाभ क्यों नहीं मिल पा रहा, यह सरकार की शैक्षिक योजनाओं पर प्रश्नवाचक है। इसे उच्च स्तर पर सोचना, विचारना आवश्यक है। जब तक आदिवासियों के शैक्षिक स्तर का सुधार नहीं होगा, उनका हर स्तर पर शोषण होता रहेगा। शैक्षिक स्तर बढ़ने पर ही उसे अपने अधिकारों की जानकारी होगी एवं वह अपने ख़िलाफ़ हो रहे हर स्तर के शोषण एवं संघर्ष - जंगल, ज़मीन एवं जल या यों कहें, रोटी, कपड़ा और मकान के प्रति आवाज़ उठा पायेगा, तभी भारत के आदिजन पूर्ण स्वतन्त्रता एवं सम्मान के साथ जीवन जी सकेगा।

मेरे इस आलेख का उद्देश्य देश की प्रगति, शासन प्रशासन या सरकार के द्वारा चलाई जा रही योजनाओं की आलोचना करना नहीं है, वरन् आदिवासियों के साथ हो रहे अन्याय, अत्याचार, शोषण के प्रमुख कारणों, समस्याओं पर चिन्तन करना है, जिसे मैंने संजीव की "टीस" कहाने का आधार लेते हुये अपनी लेखनी से व्यक्त किया है।

*138-139, श्यामा प्रसाद मुखर्जी नगर, निवाई, जिला टोंक (राजस्थान), alok_newai@yahoo.co.in, 09261515507

**83, कैलाशपुरी, रामगढ़ मोड़, आमेर रोड़, जयपुर 302002 (राजस्थान), akgraj@gmail.com, 09928792127


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