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| 09.13.2007 |
| तुम होते तो आलोक शंकर |
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इतना कुरूप अंतर का यह शृंगार न होता नयनों में यह बद्ध नीर, उर का पीड़ित संसार न होता । मानस-पटल घने कोहरे में जब भी दुःखाकुल होता; शोक-मलिन उर के पट पर नयनों की उजियाली मलता । विपदा के वीरानों में जब भी आहट तेरी दिखती; निज - प्राणों के टुकड़े करके, सुख - संगीत बहा देता । प्रिये ! तुम्हारा मन किंचित, अँधियारों से विचलित होता; प्रकृति से विद्रोह उठा मैं नव- आदित्य उगा देता ……… तुम होते तो । |
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