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| 03.22.2008 |
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सुनामी |
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आगत में स्वागत में रत उत्साहित
था यह संसार, धरती ने जो ली अंगडाई, आया जग में इक भूचाल, जाते जाते क्यूँ दे गया, गत वर्ष हमको यह संत्रास, देख रहे थे छटा निराली, बिखरा सिकता सोना तट पर, चारों ओर था अंधकार, मचा हुआ था हाहाकार, उठा उसे बाहों में अपनी, बचा लिया यूँ सागर ने, जीवन में आएँगे यूँ तो, नित नित जाने कितने क्लेश, उठो करें स्वागत हम कल का, जीवन में हो नव संचार, सुमन समर्पित श्रद्धा के, उनको जो हो गए बह्म में लीन, नहीं हारना पुन: बनाएँगे, हम तट पर नीड़ नया, मंत्र है आशा ही जीवन का, कभी न दुख से मानों हार, |
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